गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 87, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २८ ।। ४९ दोषपति ( बुराइयों का स्वामी ) इस बात में चिन्ता करने लगा—तीन [ वेदविशेषों ] के साथ सोमरस पीना चाहिये—पूरा किया हुआ सा कर्म होता है । ( तस्मात् ऋग्यजुः सामानि अपक्रान्ततेजांसि आसन् ) उससे [ चौथे वेद के छूट जाने से ] ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद बिना तेज वाले हो गये । ( तत्र महर्षयः परिदेवयाञ्चक्रिरे ) उस पर महर्षि लोग विलाप करने लगे—( महत् शोकभयं प्राप्ताः स्मः ) हमको बड़ा शोक और भय प्राप्त हुआ है । ( न च एतत्, सर्वैः समभिहितम् ) और यही नहीं [ किन्तु ] सबने मिलकर कहा—( ते वयम् भगवन्तम् एव उपधावाम ) सो हम ऐश्वर्यवान् [ ओम् ] के ही पास दौड़ कर चलें । [ वे गये और ओम् ने कहा ]— ( सर्वेषाम् एव शर्म भवानि इति ) सब लोगों का ही शरण [ रक्षा साधन ] मैं हो जाऊँ । ( तथा इति ते उक्त्वा तूष्णीम् अतिष्ठन् ) वैसा हो—ऐसा कहकर वे चुपचाप बैठ गये । [ फिर बोले ] ( न अनुपसन्नेभ्यः इति ) पास न रहने वालों [ नास्तिकों ] के लिये [ शरण ] मत हो [ ओम् बोला ] ( उपोसीदामि इति ) [ तुम्हारे ] अति समीप मैं बैठता हूँ । ( नीचैः बभूवुः ) वे [ ऋषि ] नीचे को हो गये । ( सः उपनीय एभ्यः प्र उवाच ) वह [ ओम् ] पास जाकर इनसे कहने लगा— ( मामिकाम् एव व्याहृतिम् आदितः आदितः कृणुध्वम् इति एवं मामकाः आधीयन्ते ) मेरी ही व्याहृति को प्रत्येक मन्त्र के आदि में करो, इस प्रकार मेरे लोग सब ओर से धारण किये जाते हैं । ( भृग्वङ्गिरोविद्भ्यः ऋते सोमः न पातव्यः ) भृगु अङ्गिराओं [ प्रकाशमान ५ ात्मा के चारों वेदों ] के जानने वाले के बिना सोम रस न पीना चाहिये । [ जो दूसरे लोग सोम रस पीवें तो ] ( ऋत्विजः पराभवन्ति यजमानः रजसा अपध्वस्यति श्रुतिः च अपध्वस्ता तिष्ठति इति ) ऋत्विज् लोग हार जाते हैं, यजमान राग [ मोह ] से गिर पड़ता है और श्रुति नष्ट होकर रहती है—( एवम् एव उत्तरोत्तरात् योगात् तोकं तोकं प्रशाध्वम् इति ) इस प्रकार से ही पिछले पिछले संयोग से संतान संतान को शासन करो, ( एवं प्रतापः न पराभविष्यति इति ) इस प्रकार प्रताप न हार पावेगा । ( तथा आह तथा आह ) वैसा ही उसने कहा, वैसा ही उसने कहा । [ ऋषि लोग बोले ] ( भगवन् इति ) हे भगवन् ! [ हम वैसा ही करेंगे ] ( प्रतिपेदिरे आप्याययन् ) वे समीप गये और बढ़ने लगे । ( ते तथा वीतशोकभयाः बभूवुः ) निन्दितकर्मणां पालकः ( अपक्रान्ततेजांसि ) विगतज्योतींषि (परिदेवयाञ्चक्रिरे) परि+दिवु परिकूजने—चुरादित्वात् णिच्, प्रत्ययान्तत्वात् आम् प्रत्ययः । अया- मन्ता० ( पा० ६ । ४ । ५५ ) इति णेरयादेशः, कृञ्चानुप्रयुज्यते० ( पा० ३ । १ । ४० ) इति कृञ् धातोरनुप्रयोगः । लिटि बहुवचने 'चक्रिरे' इति रूपम् । विलापं कृतवन्तः । ( न ) निषेधे ( अनुपसन्नेभ्यः ) नञ्+उप+षद्ऌ गतौ—क्तः । असमीपस्थेभ्यः । नास्तिकेभ्यः ( मामिकाम् ) मदीयाम् (ऋते) विना (योगात्) संयोगात् (प्रशाध्वम्) प्रशासनं कुरुत ( भगवन् ) हे ऐश्वर्यवन् ॥ ४