गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 90, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें५२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २६ ॥ ( भृग्वङ्गिरोविदा संस्कृतः अन्यान् वेदान् अधीयीत ) प्रकाशमान ज्ञानवाला [ चारों वेदों के जानने वाले ] से संस्कार किया हुआ [ पढ़ाया हुआ पुरुष ] दूसरे वेदों [ शास्त्रों ] को पढ़े, ( अन्यत्र संस्कृतः भृग्वङ्गिरसः न अधीयीत ) दूसरे [ शास्त्रों ] में संस्कार किया हुआ पुरुष प्रकाशमान ज्ञानवाले [ चारों वेदों ] को न पढ़े । ( अथ सामवेदे खिलश्रुतिः ) और सामवेद में भी खिलश्रुति [ सारभूत मन्त्र ] है—( ब्रह्मचर्येण च एतस्मात् अथर्वाङ्गिरसः ह यः वेद सः वेद सर्वम् इति ब्राह्मणम् ) और इसलिये ब्रह्मचर्य्य के साथ निश्चल ब्रह्म के ज्ञानों [ चारों वेदों ] को निश्चय करके जो जानने वाला है वह सब जानता है, यह ब्राह्मण [ ब्रह्म ज्ञान ] है ॥ २६ ॥ भावार्थः—ब्रह्मचर्य्य के साथ वेदों में देवता, ज्योति, और स्थान का विचार करके मनुष्य सब विद्याओं में निपुण होवे ॥ २६ ॥ विशेषः—यहाँ प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १—अग्निमीडे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥ ऋ० १ । १ । १ ॥ ( पुरोहितम् ) सबके अगुआ, ( यज्ञस्य ) श्रेष्ठ कर्म के ( देवम् ) प्रकाशक, ( ऋत्विजम् ) सब ऋतुओं में पूजनीय ( होतारम् ) दान करने हारे और ( रत्नधातमम् ) अत्यन्त रत्नों के धारण करने वाले ( अग्निम् ) अग्नि [ ज्ञानमय परमेश्वर ] की ( ईडे ) मैं बड़ाई करता हूँ ॥ २—इषे त्वोर्जे त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मण आप्यायध्वमघ्न्या इन्द्राय भागं प्रजावतीरनमीवा अयक्ष्मा मा व स्तेन ईशत माघश- शँसो ध्रुवा अस्मिन् गोपतौ स्यात बह्वीर्यजमानस्य पशून् पाहि ॥ यजु० १ । १ ॥ [ हे प्रजागण ! ] मैं ( त्वा ) तुझमें ( इषे ) व्यापक हूँ, मैं ( त्वा ) तुझको ( ऊर्जे १ ) बलवान् बनाता हूँ । [ हे प्रजाओ ! ] ( वायवः ) तुम सब वायु [ वेगवान् ] ( स्थ ) हो, ( देवः ) प्रकाशमय, ( सविता ) सबका चलाने वाला परमेश्वर ( वः ) तुमको ( श्रेष्ठतमाय ) अत्यन्त श्रेष्ठ ( कर्मणे ) कर्म के लिये ( प्र + अर्पयतु ) आगे बढ़ावे । ( अघ्न्याः ) हे अवध्य वा अहिंसक प्रजाओ ! ( इन्द्राय परम ऐश्वर्य के लिये ( भागम् ) अपने भाग को ( आ ) भली भांति ( प्यायध्वम् ) तुम बढ़ाओ, ( प्रजावतीः ) हे उत्तम सन्तान वाली, ( अनमीवाः ) मानसिक पीड़ा से रहित और ( अयक्ष्माः ) क्षय आदि , शारीरिक रोग से रहित प्रजाओ ! ( स्तेनः ) चोर डाकू ( व ) तुम पर ( मा ईशत ) राज्य न कर सकें, और ( मा अघशंसः )"न कोई पाप चिन्तक [ राज्य कर सके ] ' और तुम ( ध्रुवाः ) निश्चल चित्त और ( बह्वी ) बहुत सी होकर ( अस्मिन् ) इस ( गोपतौ ) स्वर्ग वा पृथ्वी वा गो आदि के रक्षक परमेश्वर में ( स्यात ) वर्तमान रहो । [ हे प्रजागण ! ] ( यजमानस्य ) यज्ञकर्ता धर्मात्मा पुरुष के ( पशून् ) दोपाये और चौपाये जीवों की ( पाहि ) तू रक्षा कर ॥
१. यहाँ 'इषे' 'ऊर्जे' पद चतुर्थ्यन्त हैं । तिङन्तानुसारी अर्थ चिन्त्य है । सम्पा० ॥