भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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विषयानुक्रमणिका. (११) | विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ. | | कुवैद्यनिंदा .... .... १७२ | ज्वरकी विशेषता .... .... १७९ | | वैद्यका लक्षण .... .... ,, | वातज्वरमें पाचन .... .... ,, | | वैद्यकशास्त्रोंकी पठनकी आवश्यकता .... ,, | पित्तज्वरका पाचन .... .... १८० | | रोग नहीं जाननेसे हानि .... १७३ | कफज्वरमें पाचन .... .... ,, | | वैद्यशास्त्रज्ञातांका फल .... ,, | संनिपातज्वरमें पाचन .... .... ,, | | रोगादिक जाननेकी आवश्यकता .... ,, | ज्वरमें पथ्य .... .... ,, | | देशकालादिक जाननेकीं | वातज्वरका निदान और चिकित्सा .... ,, | | आवश्यकता .... .... ,, | वातज्वरका पाचन.... .... १८१ | | रोगहेतु वातादि दोष .... .... ,, | अन्नहीन औषधका गुण और .... ,, | | रोगपरीक्षाकें प्रकार .... १७४ | निषेधका विशेष वर्णन .... .... ,, | | साध्यासाध्यका लक्षण .... ,, | पाचन हुए औषधका लक्षण .... ,, | | साध्यादिक होनेका कारण .... ,, | उछलनेवालें औषधका लक्षण .... ,, | | उपद्रवका लक्षण .... .... ,, | पाचन होनेमें शेष रहे औषधका लक्षण ,, | | रोग निर्मूल करनेकी आज्ञा .... १७५ | भोजनके उपरांत देनेके औषधका गुण १८२ | | सूक्ष्म भी रोग शत्रुसमान है .... ,, | वातज्वरमें पंचमूलका काथ .... ,, | | रोगके फैलनेके प्रथम ही प्रती- | पित्तज्वरके निदान और चिकित्सा .... ,, | | कार करना .... .... ,, | रोध्रादि काथ .... .... १८३ | | व्याधियोंका प्रकार.... .... १७६ | शक्राहादि काथ .... .... ,, | | तीनप्रकारके व्याधियोंका प्रकार .... ,, | दुरालभादि काथ .... .... ,, | | ज्वरकी व्यापकता.... .... ,, | पित्तपापडा काथ.... .... ,, | | जातिपरत्वमें ज्वरकी असाध्यता.... ,, | शुंठीदि काथ .... .... १८४ | | ज्वरकी बलिष्ठता .... .... ,, | गुडूच्यादि काथ .... .... ,, | | मनुष्य ज्वर सह सकता है तिसका कारण १७७ | द्राक्षादि काथ .... .... ,, | | सर्वरोगमें ज्वरकी श्रेष्ठता .... ,, | दाहतृषामूर्च्छाके उपर विदार्यादिकां | | पृथक् प्राणिभेदसे ज्वरके नामान्तर .... ,, | उपचार दाहज्वरकी उपाय.... .... ,, | | ज्वरके स्वरूपका लक्षण .... १७८ | ज्वरशोषकी उपाय .... .... १८५ | | ज्वरकी उत्पत्ति .... .... ,, | कफज्वरकी निदान और चिकित्सा .... ,, | | ज्वरकी निदानसहित संप्राप्ति .... ,, | कफज्वरका पाचन पिप्पल्यादि कल्क ,, | | ज्वरके हेतु .... .... १७९ | व्याघ्रादि कल्क .... .... १८६ | | प्रकट हुए ज्वरका लक्षण .... ,, | वासादि काथ .... .... ,, |