भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 8

वक्तव्य । हारीतसंहिता सुप्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसकी चर्चा या इसके प्रणेताकी चर्चा वैद्यके सैकड़ों ग्रन्थोंमें की गयी है। इस संस्करणमें अनेकों विशेष विषय बताये हैं। जिन्हें आप पढ़नेसे और गत संस्करणके देखनेसे ही समझ सकेंगे। अबकी सभी त्रुटियां यथासम्भव निकाल दी गयी हैं। इस कारण इसका संशोधन प्रयागीय मासिकपत्र "आलोक"के सम्पादक, आयुर्वेदाचार्य कविरत्न पं० कालीप्रसाद शास्त्रीजीने किया है। आशा है इससे विद्वन्मनोरञ्जन अवश्य होगा। संस्कृत और हिन्दी अल्प ही परि- वर्तनसे बड़ी उत्तम हो गयी है। गूढ़ और गम्भीर उलझनोंको सुलझानेके लिये विशद् गवेषणापूर्ण सरल संस्कृत और हिन्दीमें टिप्पणियां लगा दी गयी हैं। साथ ही मनोहर धन्वन्तरिस्तव भी प्रथम पाठार्थ लगा दिया है, जिससे ग्रन्थकी उपयोगिता और भी बढ़ गयी है। हमें आशा है कि, हमारा यह ग्रन्थ वैद्यकप्रेमियोंमें विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा। प्रकाशक- २० । ३ । १९२७ खेमराज श्रीकृष्णदास. अपनी बात । प्रिय पाठको ! आपके हाथमें यह ग्रन्थ रखते हुए मुझे हर्ष होता है। हमारा दृढ़ विश्वास है कि इस नूतन संस्करणको देखकर आप अवश्य सानन्द होंगे। यथासम्भव और यथाविवेक हमने इसके प्रत्येक भागपर दृष्टि डाली है। जो कुछ इसके उत्तम बनानेमें कर सकते थे किया। यह बात आप गतसंस्करणको देखकर समझ लेंगे। हमारा विशेष ध्यान मूलभागपर रहा है। उसीको शुद्ध और सुपाठ्य बनानेमें भरसक प्रयत्न हमने किया है। टीकामें सुबोधता और यथार्थताका ध्यान रखते हुए उचित परिवर्तन यथास्थानपर किया गया है। हिन्दी पुरानी है वह वर्तमानपद्धतिके अनुकूल कहां तक बन सकती है ? तब भी ऐसी नहीं जो सुश्राव्य और समझने योग्य न हो, वैद्यक संसारमें हारीतसंहिताकी प्रतिष्ठा कम नहीं किन्तु आर्ष और वृत्तम- ङ्गके गम्भीरगर्तमें पड़कर इसका जो भाग दुर्बोध और अदृश्य हो गया था वह पुनरुद्धृत हुआ है। हम अपने अनुभवसे कह सकते हैं कि इसका कालज्ञान, वस्तुविवेक, गुणदोषदर्शन सरल, सर्वमान्य, उपादेय और अनुभूत नुस्खांका समूह अन्यत्र दुर्लभसा है। विश्वास है कि अवशिष्ट त्रुटियोंकी ओर वैद्यकके विशिष्ट विद्वान् हमारा ध्यान दिलाएँगे, जिससे हम पुनस्त्वागत संस्करणमें उनका संशोधन कर सकेंगे। उचित ग्रन्थोंका सर्वमान्य बनाना सभीका काम होना चाहिये जिससे वे अपनी विशुद्ध प्राचीन प्रभा पुनः पा सकें। किमधिकं महत्सु । सजीवन औषधालय मु० चिलौली पो० टेढ़ा, ) निवेदक-कालीप्रसाद त्रिपाठी ( श्रीकर ) जि० उन्नाव चैत्रकृष्ण द्वितीया सं० १९८३ } सम्पादक आलोक आयुर्वेदाचार्य, कविरत्न,