भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 1169 में से

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( ९ ) ११८-उषाका स्वप्नमें प्रियतमके साथ समागम, इससे १२४-बाणासुरकी सेनाका पलायन, भगवान् शङ्करका उषाकी चिन्ता, सखियोंका उसे समझाना, अपने गणोंके साथ युद्धके लिये आगमन, कुम्भाण्डकुमारीके कहनेसे उषाका चित्रलेखाको भगवान् श्रीकृष्ण और रुद्रका युद्ध तथा बुलाकर उसे अपना कष्ट बताना, चित्रलेखाके बाणासुरका युद्धभूमिमें पदार्पण .... ७१७ बनाये हुए चित्रोंसे उषाका अनिरुद्धको १२५-श्रीकृष्णके जृम्भास्त्रसे भगवान् शङ्करका पहचानना और उन्हें लानेके लिये चित्रलेखाका जँभाईके वशीभूत होना, ब्रह्माजीके द्वारा शिव- द्वारकाको जाना ... ... ६७५ जीको विष्णुके साथ उनकी एकताका स्मरण ११९-चित्रलेखा और नारदजीका संवाद, चित्रलेखाका दिलाना तथा ब्रह्माजीके पूछनेपर मार्कण्डेयजीका नारदजीसे तामसी विद्या ग्रहण कर अनिरुद्धको हरिहरकी एकता स्थापित करते हुए शोणितपुर ले जाना, उषा और अनिरुद्धका गान्धर्व- माहात्म्यसहित हरिहरात्मक स्तोत्रका वर्णन विवाह, अनिरुद्धका बाणासुरके सैनिकों तथा करना ... ... ७२१ बाणासुरके साथ युद्ध, उनका नागपाशमें बँधकर १२६-स्वामी कार्तिकेय और श्रीकृष्णके युद्धमें स्वामी बंदी होना तथा नारदजीका द्वारका जाना ... ६८२ कार्तिकेयकी पराजय, कोटवीदेवीका कार्तिकेयकी १२०-अनिरुद्धके द्वारा आर्यादेवीकी स्तुति और रक्षा करना, बाणासुर और श्रीकृष्णका युद्ध, देवीका प्रसन्न होकर उन्हें बन्धनके कष्टसे श्रीकृष्णका बाणासुरकी हजार भुजाओंको काटना, मुक्त करना .... .... ६९५ महादेवजीका बाणासुरको महाकाल होनेका १२१-अनिरुद्धके अपहरणसे रनवासमें शोक, श्रीकृष्ण वरदान देना .... .... ७२५ और यादवोंकी चिन्ता, गुप्तचरोंकी नियुक्ति १२७-अनिरुद्धका नागपाशसे छुटकारा और उनके और उनकी विफलता, नारदजीका आगमन द्वारा श्रीकृष्ण आदिकी वन्दना, नारदजीके और अनिरुद्धका समाचार-निवेदन, श्रीकृष्णके कहनेसे उनका चोर्य-विवाह, उषाकी विदाई, द्वारा गरुड़का आवाहन और स्तवन, गरुड- सबका द्वारकाको प्रस्थान, मार्गमें श्रीकृष्णद्वारा द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति और श्रीकृष्णका वरुण देवतापर विजय, वरुणद्वारा श्रीकृष्णकी शोणितपुरको प्रस्थान .... ... ६९९ स्तुति और पूजा, श्रीकृष्णके आगमनसे द्वारका- १२२-श्रीकृष्ण, बलभद्र और प्रद्युम्नका शोणितपुरके वासियोंका हर्ष, भगवान्के आदेशसे पुरवासियों लिये प्रस्थान, गरुड़का आहवनीय अग्निको द्वारा देवताओंकी वन्दना, इन्द्रद्वारा श्रीकृष्णकी शान्त करना, श्रीकृष्णद्वारा अग्निगणोंकी प्रशंसा और सब देवताओं तथा ऋषियों आदि- पराजय, बाणासुरके सैनिकोंके साथ श्रीकृष्ण का अपने-अपने स्थानको जाना .... ७३६ आदिका युद्ध, त्रिशिरा ज्वरका आक्रमण और १२८-द्वारकामें उत्सव, उषाका अन्तःपुरमें प्रवेश श्रीकृष्णके साथ उसका युद्ध ... .... ७०८ और सत्कार, श्रीकृष्ण और विष्णुपर्वकी महिमा १२३-श्रीकृष्णसे पराजित हुए ज्वरका उनकी शरणमें तथा पर्वका उपसंहार .... ... ७४६ जाना, उनसे वर पाना और उनकी आज्ञा शिरोधार्यकर रणभूमिसे हट जाना ... ७१४ ( भविष्यपर्व ) १-जनमेजयकी संतति एवं पौरव तथा पाण्डववंश- क्यों नहीं रोका-यह जनमेजयका प्रश्न और की प्रतिष्ठाका वर्णन .... .... ७४९ उसके उत्तरमें व्यासजीद्वारा कालकी प्रबलताका २-राजा जनमेजयका अश्वमेधयज्ञ करनेका विचार, प्रतिपादन .... .... ७५० व्यासजीका आगमन और राजा द्वारा उनका ३-व्यासजीद्वारा कलियुगकी स्थितिका वर्णन .... ७५४ सत्कार, आपने पाण्डवोंको राजसूय यज्ञ करनेसे ४-कलियुगका वर्णन .... .... ७५७

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