भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 155
१३२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

स कदाचिन्निशापाये रथेन रथिनां वरः।
अब्धिकूलमुपस्पृष्टुमुपस्थातुं ययौ रविम् ॥ १५ ॥

रथियोंमें श्रेष्ठ सत्राजित् एक समय रात्रि बीतनेपर स्नान एवं सूर्योपस्थान करनेके लिये समुद्र-तटपर गये थे ॥ १५ ॥

तस्योपविष्टतः सूर्यं विवस्वानग्रतः स्थितः।
अस्पष्टमूर्तिर्भगवान्स्तेजोमण्डलवान् प्रभुः ॥ १६ ॥
अथ राजा विवस्वन्तमुवाच स्थितमग्रतः।

वे सूर्योपस्थान कर रहे थे कि इतनेमें सूर्यनारायण उनके सामने आकर खड़े हो गये। उस समय सर्वशक्तिसम्पन्न भगवान् सूर्यदेव अपने तेजस्वी मण्डलके मध्यमें विराजमान थे, इस कारण उनका रूप स्पष्ट नहीं दीख रहा था। उस समय राजाने अपने सामने खड़े हुए भगवान् सूर्यसे कहा—॥ १६॥

यथैवं व्योम्नि पश्यामि सदा त्वां ज्योतिषाम्पते ॥ १७ ॥
तेजोमण्डलिनं देवं तथैव पुरतः स्थितम् ।
को विशेषोऽस्ति मे त्वत्तः सख्येनोपागतस्य वै ॥ १८ ॥

'ज्योतिर्मय ग्रह आदिके स्वामिन् ! मैं आपको जैसे नित्यप्रति आकाशमें देखता हूँ, वैसे ही मैं आपको तेजका मण्डल धारणकर अपने सामने खड़ा हुआ देख रहा हूँ तो फिर आप जो मेरे पास मित्रतावश पधारे, इसमें विशेषता क्या हुई ?' ॥ १७-१८ ॥

एतच्छ्रुत्वा तु भगवान् मणिरत्नं स्यमन्तकम् ।
स्वकण्ठादवमुच्यैव एकान्ते न्यस्तवान् विभुः ॥ १९ ॥

इतना सुनते ही प्रभु सूर्यनारायणने अपने कण्ठसे मणिरत्न स्यमन्तकको उतारकर एकान्तमें अलग रख दिया ॥ १९ ॥

ततो विग्रहवन्तं तं ददर्श नृपतिस्तदा ।
प्रीतिमानथ तं दृष्ट्वा मुहूर्तं कृतवान् कथाम् ॥ २० ॥

तब राजा स्पष्ट अवयवोंवाले सूर्यनारायणके शरीरको देखकर प्रसन्न हुए और उन्होंने सूर्यनारायणके साथ मुहूर्त-भर (दो घड़ी) तक वार्तालाप किया ॥ २० ॥

तमपि प्रस्थितं भूयो विवस्वन्तं स सत्राजित् ।
लोकानुद्भासयस्येतान् येन त्वं सततं प्रभो ।
तदेतन्मणिरत्नं मे भगवन् दातुमर्हसि ॥ २१ ॥

बातचीत करनेके अनन्तर जब सूर्यनारायण फिर चलने लगे, तब सत्राजित्ने उनसे कहा—'भगवन् ! आप जिससे सदा इन तीनों लोकोंको प्रकाशित करते रहते हैं, उस स्यमन्तक-मणिको मुझे दे दीजिये' ॥ २१ ॥

ततः स्यमन्तकमणिं दत्त्वास्तस्य भास्करः।
स तमावद्ध्य नगरीं प्रविवेश महीपतिः ॥ २२ ॥

तब सूर्यनारायणने वह स्यमन्तक-मणि उन्हें दे दी और राजाने उसे बाँधकर नगरमें प्रवेश किया ॥ २२ ॥

तं जनाः पर्यधावन्त सूर्योऽयं गच्छतीति ह ।
पुरीं विस्मापयित्वा च राजा त्वन्तःपुरं ययौ ॥ २३ ॥

तब तो मनुष्य 'ये सूर्य जा रहे हैं' कहते हुए उनके पीछे दौड़े। इस प्रकार नगरीको विस्मित करते हुए वे राजा अपने रनवासमें चले गये ॥ २३ ॥

तत् प्रसेनजितं दिव्यं मणिरत्नं स्यमन्तकम् ।
ददौ भ्रात्रे नरपतिः प्रेम्णा सत्राजिदुत्तमम् ॥ २४ ॥

तदनन्तर राजा सत्राजित्ने मणियोंमें रत्नरूप वह दिव्य स्यमन्तक-मणि प्रेमके कारण अपने भाई प्रसेनजित्को दे दी ॥

स मणिः स्यन्दते रुक्मं वृष्ण्यन्धकनिवेशने ।
कालवर्षी च पर्जन्यो न च व्याधिभयं ह्यभूत् ॥ २५ ॥

वह मणि जिस वृष्णि और अन्धककुलवालेके घरमें रहती थी, उसके यहाँ वह सुवर्णकी वर्षा करती रहती थी। उस देशमें मेघ समयपर वर्षा करते थे और वहाँ व्याधिका भय भी नहीं होता था ॥ २५ ॥

लिप्सां चक्रे प्रसेनात्तु मणिरत्ने स्यमन्तके ।
गोविन्दो न च तल्लेभे शक्तोऽपि न जहार सः ॥२६॥

श्रीकृष्णने प्रसेनजित्से मणियोंमें रत्नके समान वह दिव्य मणि स्यमन्तक लेनी चाही, परंतु उसने नहीं दी। श्रीकृष्ण यद्यपि समर्थ थे, तथापि वह मणि उन्होंने बलपूर्वक नहीं छीनी ॥ २६ ॥

कदाचिन्मृगयां यातः प्रसेनस्तेन भूषितः ।
स्यमन्तककृते सिंहाद् वधं प्राप वनेचरात् ॥ २७ ॥

प्रसेन एक समय उस मणिसे विभूषित होकर शिकार खेलने गये और मणिके कारण ही वनमें विचरण करनेवाले सिंहके द्वारा मारे गये ॥ २७ ॥

अथ सिंहं प्रधावन्तमृक्षराजो महाबलः ।
निहत्य मणिरत्नं तदादाय विलमाविशत् ॥ २८ ॥

तदनन्तर महाबली ऋक्षराज जाम्बवान्ने उस दौड़ते

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