विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास
Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)
Page 16 of 1169
Read in context( १० )
५-व्यासजी आदिका गमन, जनमेजयके अश्वमेधयज्ञमें इन्द्रका विघ्न डालना, जनमेजयद्वारा इन्द्रको शाप, ब्राह्मणोंका निर्वासन तथा अपनी पत्नीकी भर्त्सना, विश्वावसुका जनमेजयको समझाना ... ७६१
६-जनमेजयका संतुष्ट होकर राज्य-शासन करना तथा इस ग्रन्थके पाठ और श्रवणकी महिमा ... ७६४
७-पुष्कर-प्रादुर्भावके विषयमें जनमेजयका प्रश्न और वैशम्पायनजीका उत्तर—भगवान् नारायणकी महिमाका प्रतिपादन ... .... ७६५
८-सत्ययुग आदिके परिमाणका वर्णन .... ७६७
९-प्रलयके पश्चात् एकार्णवके जलमें भगवान् नारायणका शयन .... ... ७६९
१०-एकार्णवमें भगवान् और मार्कण्डेयजीका संवाद ७७०
११-परमात्माके द्वारा भूतोंकी सृष्टि तथा ब्रह्माजीको प्रकट करनेके लिये उनकी नाभिसे एक महान् पद्मका प्रादुर्भाव .... ... ७७५
१२-नारायणके नाभिकमलके दलोंमें समस्त लोकोंकी कल्पना ... .... ७७७
१३-मधु और कैटभका ब्रह्माजीके साथ संवाद तथा भगवान् विष्णुके द्वारा वध ... .... ७७८
१४-ब्रह्माजीके तीन पुत्रोंको परम पदकी प्राप्ति, फिर उनके द्वारा मैथुनी सृष्टिका विस्तार, दक्षकन्याओंकी संततिका वर्णन ... .... ७८०
१५-जनमेजयके द्वारा महाभारत-वर्णित चरित्रकी प्रशंसा ... .... ७८५
१६-सृष्टिविषयक वर्णनके प्रसङ्गमें ज्ञान और योगका विचार ... ... ७८६
१७-मैनाककी स्थिति, मेरुपृष्ठपर परमात्मासे ब्रह्माजीका प्राकट्य, मेरुकी विशालता, ब्रह्माजीके द्वारा सृष्टि, ब्रह्म और ब्रह्माके स्वरूपका वर्णन, गङ्गाका प्रादुर्भाव, सोमकी उत्पत्ति, धर्मके पाद, योग-साधना, ऐश्वर्यसे हानि, वेदोंका प्राकट्य, यज्ञपुरुषका वर्णन, योगवेत्ताकी महिमा, चित्तकी उपलब्धिमें कारण, मोक्ष-सम्बन्धी कर्म करनेका विधान और कर्मफलके त्यागसे मुक्ति ... ७८९
१८-योगके उपसर्ग (विघ्न), योगीकी विष्णुरूपसे स्थिति, कर्मलयसे मुक्ति, सकाम कर्मियोंकी धूममार्गसे गति और पुनरावृत्ति, ज्ञानी एवं योगीको तत्त्वका साक्षात्कार तथा ब्रह्मयुगका वर्णन .... ७९५
१९-योगीकी स्थिति तथा उसके समक्ष आनेवाले विघ्नरूप ऐश्वर्योंका वर्णन ... ... ७९८
२०-ब्रह्माजीके द्वारा योगधारणपूर्वक की गयी मानसिक सृष्टिका वर्णन ... .... ८०२
२१-त्रेतायुगके प्रसंगमें ज्ञानसिद्ध ब्राह्मणोंका वर्णन, प्रजापतिदक्षद्वारा प्राणियों एवं चारों वर्णोंकी सृष्टि तथा उनका अपने पुत्रोंको धात्रीका अन्त जाननेके लिये आदेश .... ... ८०३
२२-दक्षका अपने आधे अङ्गसे स्त्रीरूप होकर बहुत-सी कन्याओंको उत्पन्न करना और उनका धर्म, कश्यप एवं सोमको दान कर देना, कश्यप और दक्षकन्याओंकी संतानोंका वर्णन तथा देवलोकमें उत्पन्न होनेवालोंकी योग्यता ... ... ८०५
२३-ब्रह्माजीके महायज्ञका वर्णन ... ... ८०७
२४-चारों आश्रमोंमें स्थित हुए ब्राह्मणोंकी ब्रह्म जी के यज्ञस्थलके पुण्य-प्रदेशमें निवासकी इच्छा .. ८११
२५-नारद आदिके द्वारा ब्राह्मणों तथा ब्रह्माजीका सत्कार, ब्रह्माजीके द्वारा कश्यपको यज्ञका आदेश, देवता-दानव-युद्ध तथा विष्णुके द्वारा मधुकी पराजय ... ... ८१२
२६-मधु और विष्णुका घोर युद्ध, देवताओं और ऋषियोंद्वारा श्रीविष्णुकी स्तुति, हयग्रीवरूपधारी विष्णुद्वारा मधुका वध और पृथ्वीको मेदिनी नामकी प्राप्ति ... .... ८१३
२७-मधुके पतनसे समस्त प्राणियोंको हर्ष, वहाँ एकत्र हुए पर्वतों और वसन्त ऋतुका वर्णन, मधुवाहिनी नदीका प्राकट्य और गौरीसिद्धाका माहात्म्य ... ... ८१७