भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 164

हरिवंशपर्व ] चत्वारिंशोऽध्यायः १४१


कृत्व च देवांस्त्रिदिवस्य देवां-
श्चक्रे सुरेशां त्रिदशाधिपत्ये ॥ २६ ॥

जिन्होंने अपने डगोंको लोकमय करके अर्थात् एक-एक डगसे एक-एक लोकको नापकर दैत्योंको पातालमें भेज दिया, देवताओंको स्वर्गका विहार करनेवाला बना दिया और देवराज इन्द्रको देवताओंके सम्राट्-पदपर स्थापित कर दिया, ॥ २६ ॥

पात्राणि दक्षिणा दीक्षा चमसोल्लूखलानि च ।
गार्हपत्येन विधिना अन्वाहार्येण कर्मणा ॥ २७ ॥

जिन्होंने गृह्यसूत्रोंमें कही हुई विधि तथा अन्वाहार्य-कर्म * के साथ (यज्ञोपयोगी) चमस, उलूखल आदि पात्र, दक्षिणा और दीक्षा आदिकी रचना की, ॥ २७ ॥

अग्निमाहवनीयं च वेदीं चैव कुशां स्रुवम् ।
प्रोक्षणीयं ध्रुवां चैव आवभृथ्यं तथैव च ॥ २८ ॥

जिन्होंने आहवनीय अग्नि, वेदी, स्रुवा, कुशाएँ, प्रोक्षणीपात्र, ध्रुवा और अवभृथ स्नानोपयोगी सामग्रीकी कल्पना की, ॥ २८ ॥

- सुधात्रीणि च यज्ञक्रे हव्यकव्यप्रदान् द्विजान् ।
हव्यादांश्च सुरान् यज्ञे क्रव्यादांस्तु पितॄनपि ॥ २९ ॥

जिन्होंने (ऊर्ध्व, मध्य और अधोगतिरूप) सुधा आदि तीन भोग्य पदार्थ बनाकर ब्राह्मणोंको हव्य-कव्य प्रदान करनेवाला, देवताओंको यज्ञमें हवि भक्षण करनेवाला और पितरोंको (श्राद्धादिमें अर्पण किये जानेवाले पिण्ड आदि) कव्य भक्षण करनेवाला बनाया, ॥ २९ ॥

भागार्थे मन्त्रविधिना यज्ञक्रे यज्ञकर्मणि ।
यूपान् समित् स्रुचं सोमं पवित्रान् परिधीनपि ॥ ३० ॥

जिन्होंने (देवताओंका) भाग निकालनेके लिये मन्त्रके प्रयोगकी विधिके साथ-साथ यज्ञकर्ममें यूप, समिधा, स्रुवा, सोम, पवित्र (पैंती) एवं परिधियोंकी कल्पना की, ॥ ३० ॥

यज्ञियानि च द्रव्याणि यज्ञांश्च सचयानलान् ।
सदस्यान् यजमानांश्च मेध्यादींश्च ऋतूत्तमान् ॥ ३१ ॥
विबभाज पुरा सर्वं पारमेष्ठयेन कर्मणा ।
युगानुरूपान् यः कृत्वा लोकाननुपराक्रमत् ॥ ३२ ॥

जिन्होंने यज्ञोपयोगी द्रव्य, यज्ञ, ईंटोंके बने अग्नि-स्थापनके स्थान तथा आहवनीय आदि तीन प्रकारकी अग्नियां, सदस्य (यज्ञकर्मका निरीक्षण करनेवाले ब्राह्मण), यजमान, उत्तम यज्ञ एवं मेध्य आदि पदार्थोंका ब्रह्माजीकी प्रचलित की हुई विधिसे विभाग किया और जिन्होंने लोकोंको युगोंके अनुरूप बनाकर फिर अपना हाथ हटा लिया, ॥ ३१-३२॥

क्षणा लवाश्च काष्ठाश्च कलाश्चैकाल्यमेव च ।
मुहूर्तास्तिथयो मासाः पक्षाः संवत्सरास्तथा ॥ ३३ ॥
ऋतवः कालयोगाश्च प्रमाणं त्रिविधं त्रिपु ।
आयुः क्षेत्राण्युपचयो लक्षणं रूपसौष्ठवम् ॥ ३४ ॥

जिन्होंने क्षण, लव, काष्ठा, कला, (प्रातः, मध्याह्न और सायंकालरूप) तीन काल, मुहूर्त, तिथि, मास, पक्ष, वर्ष, ऋतु, कालके विविध योग, (नित्य, नैमित्तिक और काम्य इन) तीन प्रकारके (प्रमेय) कर्मोंमें (श्रुति, स्मृति, शिष्टाचाररूप) तीन प्रकारका प्रमाण, आयु, क्षेत्र (स्थावर-जङ्गम शरीर), वृद्धि, (दो पैर, चार पैर आदि) लक्षण और आकृतिकी सुन्दरता रची, ॥ ३३-३४ ॥

त्रयो वर्णास्त्रयो लोकास्त्रैविद्यं पावकास्त्रयः ।
त्रैकाल्यं त्रीणि कर्माणि त्रयोऽपायास्त्रयो गुणाः ॥३५॥

जिन्होंने तीन वर्ण (शूद्रको यज्ञ करनेका अधिकार नहीं है, अतः उसका ग्रहण नहीं किया), (भू आदि) तीन लोक, (ऋक्, यजुः, सामरूप) तीन विद्याएँ, (गार्हपत्य, आहवनीय एवं दक्षिण नामकी) तीन अग्नियां, (भूत, भविष्यत्, वर्तमानरूप) तीन काल, (सात्त्विक, राजस और तामसरूप) तीन कर्म, (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणारूप) तीन अपाय और (सत्त्व, रज, तमरूप) तीन गुण रचे, ॥ ३५ ॥

त्रयो लोकाः पुरा सृष्टा येनानन्त्येन कर्मणा ।
सर्वभूतगणस्रष्टा सर्वभूतगुणात्मकः ॥ ३६ ॥

जिन्होंने (जीवोंके) अनन्त कर्मोंके कारण तीन लोकोंकी रचना की, (साथ ही) जो सब प्राणियोंको रचनेवाले हैं और जिनमें सब भूतोंके गुण रहते हैं, ॥ ३६ ॥

नृणामिन्द्रियपूर्वेण योगेन रमते च यः ।
गतागताभ्यां यो नेता सर्वत्र जगदीश्वरः ॥ ३७ ॥

जो जगदीश्वर समस्त ब्रह्माण्डमें जीवात्माको जन्म-मृत्यु देनेके कारण सबके नेता हैं और जो (जीवरूपसे) इन्द्रियोंका विषयोंके साथ संयोग करके सर्वत्र रमण करते हैं, ॥ ३७ ॥


* पितरोंके निमित्तसे प्रति अमावास्याको किया जानेवाला मासिक श्राद्ध।