विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास
Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)
Page 165 of 1169
Read in context| १४२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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यो गतिर्धर्मयुक्तानामगतिः पापकर्मणाम्।
चातुर्वर्ण्यस्य प्रभवश्चातुर्होत्रस्य रक्षिता ॥ ३८ ॥
जो धर्म करनेवालोंकी गति (गन्तव्य स्थान) हैं और पापकर्म करनेवालोंकी अगति हैं अर्थात् पापकर्म करनेवाले जिनको नहीं पा सकते, जो चारों वर्णोंके उत्पत्तिस्थान हैं (यह बात ‘ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्’ आदि श्रुतिको लक्ष्य करके कही गयी है) और जो (जिसमें चार ऋत्विज् हवन करते हैं ऐसे) चातुर्होत्र (यज्ञ) के रक्षक हैं, ॥ ३८ ॥
चातुर्विद्यस्य यो वेत्ता चातुराश्रम्यसंश्रयः ।
दिगन्तरो नभोभूतो वायुरापो विभावसुः ॥ ३९ ॥
जो (आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीतिरूप) चार विद्याओंके ज्ञाता हैं, जो (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यासरूप) चारों आश्रमोंके आश्रय हैं (अर्थात् जिनकी प्राप्तिके लिये चारों आश्रमोंके धर्मोंका पालन किया जाता है) और दिशाएँ जिनके गर्भमें रहती हैं (अर्थात् जो दिशाओंको भी अवकाश देते हैं) तथा जो वायु, आकाश, जल, अग्नि और पृथिवीरूप हैं, ॥ ३९ ॥
यश्चन्द्रसूर्ययोर्ज्योतिर्योगीशः क्षणदान्तकः ।
यत् परं श्रूयते ज्योतिर्यत् परं श्रूयते तपः ॥ ४० ॥
जो चन्द्रमा और सूर्यको भी ज्योति देनेवाले हैं, योगीश्वर हैं, (मोहरूपी) रात्रिका अन्त करनेवाले हैं, जो परम ज्योतिःस्वरूप सुने जाते हैं अर्थात् जिनका ज्योतिःस्वरूप नेत्र सर्वत्र सब कुछ देखता है और जो परम तपःस्वरूप सुने जाते हैं अर्थात् जो परम तपस्याके द्वारा प्राप्त होते हैं, ॥ ४० ॥
यं परं प्राहुरपरं यः परः परमात्मवान् ।
नारायणपरा वेदा नारायणपराः क्रियाः ॥ ४१ ॥
जिनको पर (सूत्रात्मा) और अपर (विराट्) भी कहते हैं और जो परात्पर हैं अर्थात् सूत्रात्मासे भी पर माया सम्पन्न महेश्वर सगुण ब्रह्म हैं, आत्मवान् हैं अर्थात् आत्माके समान ही मायारूपी शरीरवाले हैं। वेद नारायणका ही निरूपणकरते हैं। सभी क्रियाओंका पर्यवसान भी नारायणमें ही होता है ॥ ४१ ॥
नारायणपरो धर्मो नारायणपरा गतिः ।
नारायणपरं सत्यं नारायणपरं तपः ॥ ४२ ॥
धर्मका लक्ष्य भी नारायण हैं, सम्पूर्ण गतियोंकी परम गति नारायण हैं, नारायण ही सत्यके आधार हैं और नारायण ही तपके द्वारा प्राप्य हैं ॥ ४२ ॥
नारायणपरो मोक्षो नारायणपरायणम् ।
आदित्यादिस्तु यो दिव्यो यश्च दैत्यान्तको विभुः ॥ ४३ ॥
नारायण ही मोक्षके आधार हैं। नारायण ही परम आश्रयरूप हैं। जो प्रभु आकाशमें विचरण करनेवाले आदित्य आदि ग्रहोंके स्वरूपमें स्थित हैं और दैत्योंका संहार करनेवाले हैं ॥ ४३ ॥
युगान्तेध्वन्तको यश्च यश्च लोकान्तकान्तकः ।
सेतुर्यो लोकसेतूनां मेध्यो यो मेध्यकर्मणाम् ॥ ४४ ॥
जो प्रलयके समय कालका रूप धारण कर लेते हैं, संसारका अन्त करनेवाले यमके भी यम हैं, मृत्युकी भी मृत्यु हैं, लोकोंकी मर्यादा बाँधनेवाले (मनु आदिके भी) सेतु हैं अर्थात् मनु आदिको भी मर्यादामें रखनेवाले हैं और पवित्र करनेवाले (गङ्गा आदि तीर्थों) को भी पवित्र करनेवाले हैं ॥
वेद्यो यो वेदविदुषां प्रभुर्यः प्रभवात्मनाम् ।
सोमभूतस्तु सौम्यानामग्निभूतोऽग्निवर्चसाम् ॥ ४५ ॥
जो वेदके ज्ञाताओंद्वारा जानने योग्य हैं, प्रभुत्व स्वभाववाले (मरीचि आदि) के भी प्रभु हैं और जो सौम्य पुरुषोंमें चन्द्रमाकी भाँति प्रियदर्शन हैं, जो अग्निके समान तेजस्वी पुरुषोंमें अग्निस্বরূপ हैं ॥ ४५ ॥
मनुष्याणां मनोभूतस्तपोभूतस्तपस्विनाम् ।
विनयो नयवृत्तीनां तेजस्तेजस्विनामपि ।
सर्गाणां सर्गकारश्च लोकहेतुरनुत्तमः ॥ ४६ ॥
जो मनुष्योंके मनरूप हैं, तपस्वियोंके तपरूप हैं, जो नीतिमान् पुरुषोंमें नम्रतारूपसे विराजमान रहते हैं और तेजस्वियोंमें तेजःस्वरूप हैं और जो सृष्टियोंके रचनेवाले तथा संसारके सर्वश्रेष्ठ कारण हैं ॥ ४६ ॥
विग्रहो विग्रहार्हाणां गतिर्गतिमत्तामपि ।
आकाशप्रभवो वायुर्वायुप्राणो हुताशनः ॥ ४७ ॥
जो शरीर धारण करके अवतार लेनेवाले देवताओंके विग्रहरूप हैं, गतिमानोंकी गति हैं, आकाशमे उत्पन्न होनेवाले वायु हैं तथा वायुसे जीनेवाले अग्निस্বরূপ हैं ॥ ४७ ॥
देवा हुताशनप्राणाः प्राणोऽग्नेर्मधुसूदनः ।
रसाद् वै शोणितं जातं शोणितान्मांसमुच्यते ॥ ४८ ॥