भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 739

विष्णुपर्व ] चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७१७


प्रणम्य मामेकमनाः पठेत् तु यः
स वै भवेज्ज्वर विगतज्वरो नरः ॥ ३५ ॥

**श्रीभगवान् बोले—**ज्वर ! इस महासमरमें केवल बाहुबल ही हमारा-तुम्हारा अस्त्र रहा है; जो मुझे प्रणाम करके एकचित्त होकर हम दोनोंके इस पराक्रमका पाठ करे, वह मनुष्य अवश्य ज्वररहित हो जाय ॥ ३५ ॥

त्रिपाद् भस्मप्रहरणस्त्रिशिरा नवलोचनः ।
स मे प्रीतः सुखं दद्यात् सर्वामयपतिर्ज्वरः ॥ ३६ ॥

जिसके तीन पैर हैं, भस्म ही आयुध है, तीन सिर हैं और नौ नेत्र हैं, वह समस्त रोगोंका अधिपति ज्वर प्रसन्न होकर मुझे सुख प्रदान करे ॥ ३६ ॥

आद्यन्तवन्तः कवयः पुराणाः
सूक्ष्मा बृहन्तोऽप्यनुशासितारः ।
सर्वाञ्ज्वरान् घ्नन्तु ममानिरुद्ध-
प्रद्युम्नसंकर्षणवासुदेवाः ॥ ३७ ॥

जगत्के आदि और अन्त जिनके हाथोंमें हैं, जो ज्ञानी, पुराणपुरुष, सूक्ष्मस्वरूप, परम महान् और सबके अनुशासक हैं, वे अनिरुद्ध, प्रद्युम्न, संकर्षण और भगवान् वासुदेव सम्पूर्ण ज्वरोंका नाश करें (इस प्रकार प्रार्थना करनेवालोंका ज्वर दूर हो जाय) ॥ ३७ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कृष्णेन ज्वरः साक्षान्महात्मना ।
प्रोवाच यदुशार्दूलमेवमेतद् भविष्यति ॥ ३८ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन् ! साक्षात् महात्मा श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर ज्वरने उन यदुश्रेष्ठसे कहा—'यह ऐसा ही होगा'॥

वरं लब्ध्वा ज्वरो हृष्टः कृष्णाच्च समयं पुनः ।
प्रणम्य शिरसा कृष्णमपक्रान्तस्ततो रणात् ॥ ३९ ॥

श्रीकृष्णसे वर पाकर और उनकी शर्तको स्वीकार करके ज्वरको बड़ा हर्ष हुआ। वह मस्तक झुकाकर श्रीकृष्णको प्रणाम करनेके अनन्तर उस रणक्षेत्रसे दूर चला गया ॥ ३९ ॥

इति श्रीमद्भारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि ज्वरकृष्णसंवादे त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें ज्वर और श्रीकृष्णका संवादविषयक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२३ ॥


चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

बाणासुरकी सेनाका पलायन, भगवान् शङ्करका अपने गणोंके साथ युद्धके लिये आगमन, भगवान् श्रीकृष्ण और रुद्रका युद्ध तथा बाणासुरका युद्धभूमिमें पदार्पण

वैशम्पायन उवाच
ततस्ते त्वरिताः सर्वे त्रयस्त्रय इवाग्नयः ।
वैनतेयमथारुह्य युध्यमाना रणे स्थिताः ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! तदनन्तर तीन अग्नियोंके समान वे सब तीनों वीर बड़ी उतावलीके साथ गरुड़पर आरूढ़ हो शत्रुओंके साथ युद्ध करते हुए रणभूमिमें डटे रहे ॥ १ ॥

ततः सर्वाण्यनीकानि बाणवपरवारिणः ।
अर्दयन् वैनतेयस्था नदन्तोऽतिबलाद् रणे ॥ २ ॥

गरुड़पर चढ़े हुए उन वीरोंने सिंहनाद करके बाणासुरकी समस्त सेनाओंको अपनी बाणवर्षासे ढक दिया और अत्यन्त बलपूर्वक उन्हें पीड़ा देना आरम्भ किया ॥ २ ॥

चक्राङ्गलपत्तैिश्च बाणवर्षैश्च पीडितम् ।
संचुकोप महानीकं दानवानां दुरासदम् ॥ ३ ॥

चक्र और हलकी मारसे तथा बाणोंकी वर्षासे पीड़ित होकर दानवोंकी वह दुर्जय विशाल सेना अत्यन्त कुपित हो उठी ॥ ३ ॥

कक्षेऽग्निरिव संवृद्धः शुष्केन्धनसमीरितः ।
कृष्णबाणाग्निरुद्गतो विवृद्धिं परमां गतः ॥ ४ ॥

जैसे तिनकोंके बोझमें आग लग जाय और सूखे ईंधनका सहारा पाकर वह और भी बढ़ जाय उसी प्रकार श्रीकृष्णके बाणोंसे जो अग्नि प्रकट हुई, वह अत्यन्त वृद्धिको प्राप्त होने लगी ॥ ४ ॥

दानवानां सहस्राणि तस्मिन् समरमूर्धनि ।
युगान्ताग्निरिवार्चिष्मान् दहमानो व्यराजत ॥ ५ ॥

वह उस युद्धके मुहानेपर सहस्रों दानवोंको दग्ध करती हुई ज्वाला-मालाओंसे मण्डित प्रलयाग्निके समान प्रकाशित हो रही थी ॥ ५ ॥

तां दीर्यमाणां महतीं नानाप्रहरणार्दिताम् ।
सेनां बाणः समासाद्य वारयन् वाक्यमब्रवीत् ॥ ६ ॥

नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे पीड़ित हो भागती हुई उस विशाल सेनाके पास पहुँचकर बाणासुर उसे रोकता हुआ इस प्रकार बोला—॥ ६ ॥

लाघवं समुपागम्य किमर्थं भयविह्वलाः ।
दैत्यवंशसमुत्पन्नाः पलायध्वं महाहवात् ॥ ७ ॥

'वीरो ! तुम दैत्यवंशमें उत्पन्न होकर भी किसलिये लघुता (कायरता) का आश्रय ले भयसे व्याकुल हो इस महासमरसे पलायन कर रहे हो ॥ ७ ॥

कवचासिगदाप्रासखड्गचर्मपरश्वधान् ।
उत्सृज्योत्सृज्य गच्छन्ति किं भवन्तोऽन्तरिक्षगाः ॥ ८ ॥

'कवच, खड्ग, गदा, प्रास, ढाल, तलवार और फरसे फेंक-फेंककर तुम आकाशमार्गसे क्यों भागे जा रहे हो ॥ ८ ॥

स्वजातिं चैव भावं च हरसंसर्गमेव च ।
मानयद्भिर्न गन्तव्यमेषो ह्यहमवस्थितः ॥ ९ ॥