विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 747, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७२५
शिव ! आपको प्रणाम है। भगवान् ! महादेव ! आपको नमस्कार है। देवपूजित परमेश्वर ! आपको प्रणाम है ॥ ५६॥
नमस्ते सामभिर्गीत नमस्ते यजुभिः सह ।
नमस्ते सुरशत्रुघ्न नमस्ते सुरपूजित ॥ ५७ ॥
नमस्ते कर्मिणां कर्म नमोऽमितपराक्रम ।
हृषीकेश नमस्तेऽस्तु स्वर्णकेश नमोऽस्तु ते ॥ ५८ ॥
सामवेदके मन्त्रोंद्वारा गाये जानेवाले परमात्मन् ! आपको नमस्कार है। यजुर्वेदके साथ सम्बन्ध रखनेवाले देवता ! आपको प्रणाम है। आप ही कर्मपरायण पुरुषोंके कर्म हैं, आपको नमस्कार है। आपके पराक्रमकी कोई सीमा नहीं है—आपको नमस्कार है। देवद्रोहियोंका नाश करनेवाले श्रीकृष्ण ! आपको नमस्कार है। देवपूजित महादेव ! आपको प्रणाम है। हृषीकेश ! आपको नमस्कार है। सुनहरे केशवाले शिव ! आपको प्रणाम है ॥ ५७-५८ ॥
इमं स्तवं यो रुद्रस्य विष्णोश्चैव महात्मनः ।
समेत्य ऋषिभिः सर्वैः स्तुतौ स्तौति महर्षिभिः ॥ ५९ ॥
व्यासेन वेदविदुषा नारदेन च धीमता ।
भारद्वाजेन गर्गेण विश्वामित्रेण वै तथा ॥ ६० ॥
अगस्त्येन पुलस्त्येन धौम्येन तु महात्मना ।
य इदं पठते नित्यं स्तोत्रं हरिहरात्मकम् ॥ ६१ ॥
अरोगो बलवांश्चैव जायते नात्र संशयः।
श्रियं च लभते नित्यं न च स्वर्गात्निवर्तते ॥ ६२ ॥
वेदवेत्ता व्यास, बुद्धिमान् नारद, भारद्वाज, गर्ग, विश्वामित्र, अगस्त्य, पुलस्त्य और महात्मा धौम्य आदि समस्त ऋषि-महर्षियोंने एकत्र होकर जिनकी स्तुति की थी, उन्हीं भगवान् रुद्र और महात्मा विष्णुके इस स्तोत्रको पढ़कर जो उनकी स्तुति करता है तथा जो प्रतिदिन इस हरिहरात्मक स्तोत्रका पाठ करता है, वह इस जगत्में नीरोग और बलवान् होता है, इसमें संशय नहीं है। वह सदा लक्ष्मी (धन-सम्पत्ति) पाता है और स्वर्गसे कभी पीछे नहीं लौटता है ॥ ५९–६२॥
अपुत्रो लभते पुत्रं कन्या विन्दति सत्पतिम् ।
गुर्विणी शृणुते या तु वरं पुत्रं प्रसूयते ॥ ६३ ॥
पुत्रहीन पुरुष इसके पाठसे पुत्र पाता है, कुमारी कन्या श्रेष्ठ पति प्राप्त कर लेती है तथा जो गर्भवती स्त्री इसका श्रवण करती है, वह उत्तम पुत्रको जन्म देती है ॥ ६३ ॥
राक्षसाश्च पिशाचाश्च विघ्नानि च विनायकः ।
भयं तत्र न कुर्वन्ति यत्रायं पठ्यते स्तवः ॥ ६४ ॥
जहाँ प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ किया जाता है, वहाँ राक्षस, पिशाच, विघ्न और विनायक भय नहीं उपस्थित करते हैं ॥ ६४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि हरिहरात्मकस्तवो नाम पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें 'हरिहरात्मकस्तोत्र' विषयक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥
षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
स्वामी कार्तिकेय और श्रीकृष्णके युद्धमें स्वामी कार्तिकेयकी पराजय, कोटवीदेवीका कार्तिकेयकी रक्षा करना, बाणासुर और श्रीकृष्णका युद्ध, श्रीकृष्णका बाणासुरकी हजार भुजाओंको काटना, महादेवजीका बाणासुरको महाकाल होनेका वरदान देना
जनमेजय उवाच
अपयाते ततो देवे कृष्णे चैव महात्मनि ।
पुनश्चासीत् कथं युद्धं परेषां लोमहर्षणम् ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन् ! जब महादेवजी तथा महात्मा श्रीकृष्ण युद्धसे हट गये, तब पुनः शत्रुओंका रोमाञ्चकारी युद्ध किस प्रकार हुआ ? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
कुम्भाण्डसंगृहीते तु रथे तिष्ठन् गुहस्तदा ।
अभिदुद्राव कृष्णं च बलं प्रद्युम्नमेव च ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! तब कुम्भाण्डद्वारा नियन्त्रित रथपर बैठे हुए कार्तिकेयजीने श्रीकृष्ण, बलराम तथा प्रद्युम्नपर एक साथ ही धावा किया ॥ २ ॥
ततः शरशतैरुग्रैस्तान् विव्याध रणे गुहः ।
अमर्षरोषसंक्रुद्धः कुमारः प्रवरो नदन् ॥ ३ ॥
अमर्ष और रोषसे अत्यन्त कुपित हुए सर्वश्रेष्ठ देवता कुमार कार्तिकेयने उस समय सिंहनाद करके सैकड़ों उग्र बाणोंद्वारा उन सबको रणभूमिमें घायल कर दिया ॥ ३ ॥
शरसंवृतगात्रास्ते त्रयस्त्रय इवाग्नयः ।
शोणितौघप्लुतैर्गात्रैः प्रायुध्यन्त गुहं ततः ॥ ४ ॥
उन तीनोंके सारे अङ्ग बाणोंसे आवृत हो गये। वे तीनों त्रिविध अग्नियोंके समान रक्तस्रवित अङ्गोंद्वारा ही कुमार कार्तिकेयके साथ युद्ध करने लगे ॥ ४ ॥