भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 748

७२६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

ततस्ते युद्धमार्गज्ञास्त्रयस्त्रिभिरनुत्तमैः।
वायव्याग्नेयपार्जन्यैर्बिभिदुर्दिततेजसः ॥ ५ ॥
युद्धके मार्गोंका ज्ञान रखनेवाले उन तीनों उद्दीप्त तेजस्वी वीरोंने क्रमशः वायव्य, आग्नेय और पार्जन्यास्त्रोंका प्रयोग करके कुमारको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ५ ॥

तानस्त्रांस्त्रिभिरेवास्त्रैर्विनिवार्य स पावकिः।
शैलवारुणसावित्रैस्तान स विव्याध कोपवान् ॥ ६ ॥
परंतु क्रोधमें भरे हुए अग्निनन्दन कार्तिकेयने पार्वत, वारुण और सावित्र नामक तीन अस्त्रोंद्वारा उक्त तीनों अस्त्रोंको निवारण करके पुनः उन तीनों वीरोंको घायल कर दिया ॥ ६ ॥

तस्य दीप्तशरौघस्य दीप्तचापधरस्य च।
शरौधानस्त्रमायाभिर्ग्रसन्ति स्म महात्मनः।
यदा तदा गुहः क्रुद्धः प्रज्वलन्निव तेजसा ॥ ७ ॥
स्कन्दके बाणसमूह बड़े तेजस्वी थे। उन्होंने दीप्तिमान् धनुष धारण कर रखा था तो भी जब उन महात्माके चलाये हुए शर-समूहोंको वे तीनों वीर अपने अस्त्रोंकी मायासे नष्ट करने लगे, तब कार्तिकेयको बड़ा क्रोध हुआ। वे तेजसे प्रज्वलित-से हो उठे ॥ ७ ॥

अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम कालकल्पं दुरासदम्।
संदष्टौष्ठपुटः संख्ये जगृहे पावकिः प्रभुः ॥ ८ ॥
प्रभावशाली पावकनन्दन स्कन्दने युद्धस्थलमें अपने ओठको दाँतोंसे दबा लिया और ब्रह्मशिर नामक अस्त्र उठाया, जो कालके समान दुर्जय था ॥ ८ ॥

प्रयुक्ते ब्रह्मशिरसि सहस्रांशुसमप्रभे।
उग्रे परमदुर्घर्षे लोकक्षयकरे तथा ॥ ९ ॥
हाहाभूतेषु सर्वेषु प्रधावत्सु समन्ततः।
अस्त्रतेजःप्रमूढे तु विषण्णे जगति प्रभुः।
केशवः केशिमथनश्चक्रं जग्राह वीर्यवान् ॥ १० ॥
सर्वेषामस्त्रवीर्याणां वारणं घातनं तथा।
चक्रमप्रतिचक्रस्य लोके ख्यातं महात्मनः ॥ ११ ॥
सूर्यदेवके तुल्य तेजस्वी ब्रह्मशिर नामक परम दुर्जय लोकसंहारकारी उग्र अस्त्रका प्रयोग होनेपर सब ओर हाहाकार मच गया। सब लोग इधर-उधर भागने लगे और उस अस्त्रके तेजसे मोहित हुए सारे जगत्में विषाद छा गया। तब परम पराक्रमी केशिहन्ता भगवान् केशवने चक्र हाथमें लिया, जो सभी अस्त्रोंके बलका निवारण तथा नाश करनेवाला है, जिनके सामने विरोधियोंका मण्डल ठहर नहीं सकता है, उन महात्मा श्रीकृष्णका चक्र सारे संसारमें विख्यात है ॥ ९–११ ॥

अस्त्रं ब्रह्मशिरस्तेन निष्प्रभं कृतमोजसः।
घनैरिवातपापाये सवितुर्मण्डलं यथा ॥ १२ ॥
उस चक्रने अपने बलसे उस ब्रह्मशिरनामक अस्त्रको उसी प्रकार निस्तेज कर दिया, जैसे वर्षाकालमें मेघोंके छा जानेसे सूर्यमण्डल प्रभाहीन प्रतीत होता है ॥ १२ ॥

ततो निष्प्रभतां याते नष्टवीर्ये महौजसि।
तस्मिन् ब्रह्मशिरस्यस्त्रे क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ १३ ॥
गुहः प्रजज्वाल रणे हविषेवाग्निरुल्बणः।
तदनन्तर उस महान् शक्तिशाली ब्रह्मशिर अस्त्रके निस्तेज और निर्बल हो जानेपर कार्तिकेयके नेत्र क्रोधसे लाल हो उठे। जैसे घीकी आहुति पाकर अग्नि प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार वे रणभूमिमें रोषसे जल उठे ॥ १३ ॥

शत्रुघ्नीं ज्वलितां दिव्यां शक्तिं जग्राह काञ्चनीम् १४
अमोघां दयितां घोरां सर्वलोकभयावहाम्।
तांप्रदीप्तां महोल्काभां युगान्ताग्निसमप्रभाम्।
घण्टामालाकुलां दिव्यां चिक्षेप रुषितो गुहः ॥ १५ ॥
ननाद बलवच्चापि नादं शत्रुभयंकरम्।
फिर तो उन्होंने सम्पूर्ण लोकोंको भय देनेवाली अपनी प्रिय शक्ति हाथमें ली, जो दिव्य सुवर्णमयी, अमोघ, भयङ्कर, सब ओरसे प्रज्वलित तथा शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ थी, वह दिव्य शक्ति आकाशमें बड़ी भारी उल्काके समान प्रज्वलित हो उठती थी, प्रलयकालके संवर्तक अग्निकी भाँति प्रकाशित होती थी तथा वह घण्टाओंकी मालाओंसे अलंकृत थी, रोषमें भरे हुए कार्तिकेयने उस शक्तिको चला दिया और बड़े जोरसे सिंहनाद किया, जो शत्रुओंके मनमें भय उत्पन्न करने-वाला था ॥ १४-१५ १/२ ॥

सा च क्षिप्ता तदा तेन ब्रह्मण्येन महात्मना ॥ १६ ॥
जृम्भमाणेव गगने सम्प्रदीप्तमुखी तदा।
अधावत महाशक्तिः कृष्णस्य वधकाङ्क्षिणी ॥ १७ ॥
उन ब्राह्मणभक्त महात्मा कार्तिकेयके द्वारा चलायी गयी वह शक्ति आकाशमें बढ़ने-सी लगी, उसका मुखभाग प्रज्वलित हो उठा, वह महाशक्ति श्रीकृष्णका वध करनेकी इच्छासे उनकी ओर दौड़ी ॥ १६-१७ ॥

भृशं विषण्णः शक्रोऽपि सर्वामरगणैर्वृतः।
शक्तिं प्रज्वलितां दृष्ट्वा दग्धः कृष्णेति चाब्रवीत् ॥ १८ ॥
उस समय प्रज्वलित होती हुई उस शक्तिको देखकर समस्त देवगणोंसे घिरे हुए इन्द्र भी अत्यन्त खिन्न हो गये और बोले—'हाय ! श्रीकृष्ण दग्ध हो गये' ॥ १८ ॥

तां समीपमनुप्राप्तां महाशक्तिं महामृधे।
हुङ्कारेणैव निर्भर्त्स्य पातयामास भूतले ॥ १९ ॥
परंतु श्रीकृष्णने उस महासमरमें अपने पास आयी हुई उस महाशक्तिको हुङ्कारसे ही तिरस्कृत करके पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ १९ ॥