विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 749, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७२७
पतितायां महाशक्त्यां साधुसाध्विति सर्वशः ।
सिंहनादं ततश्चक्रुः सर्वे देवाः सवासवाः ॥ २० ॥
उस महाशक्तिके धराशायिनी हो जानेपर सब ओर साधु ! साधु !! (वाह ! वाह !!) की ध्वनि होने लगी। उस समय इन्द्रसहित समस्त देवता सिंहनाद करने लगे ॥ २० ॥
ततो देवेषु नर्दत्सु वासुदेवः प्रतापवान् ।
पुनश्चक्रं स जग्राह दैत्यान्तकरणं रणे ॥ २१ ॥
तदनन्तर जब देवता सिंहनाद कर रहे थे, उसी समय प्रतापी वासुदेवने पुनः चक्र हाथमें लिया, जो रणभूमिमें दैत्योंका विनाश करनेवाला है ॥ २१ ॥
व्याविध्यमाने चक्रे तु कृष्णेनाप्रतिमौजसा ।
कुमाररक्षणार्थाय बिभ्रती सुतनुं तदा ॥ २२ ॥
दिग्वासा देववचनात् प्रविष्टा तत्र कोटवी ।
लम्बमाना महाभागा भागो देव्यास्तथाष्टमः ।
चित्रा कनकशक्तिस्तु सा च नग्ना स्थितान्तरे ॥ २३ ॥
परंतु अप्रतिम बलशाली श्रीकृष्ण ज्यों ही चक्र घुमाने लगे, त्यों ही कुमारकी रक्षाके लिये महादेवजीकी आज्ञासे महाभागा कोटवी, जो देवी पार्वतीका आठवाँ भाग थी, सुन्दर शरीर धारण किये श्रीकृष्ण और कुमारके बीचमें आकर नंगी खड़ी हो गयी। वह आकाशमें निराधार लटक रही थी। वह विचित्र सुवर्णमयी शक्ति तथा वह देवी कोटवी दोनों ही (श्रीकृष्ण और कुमारके) बीचमें विद्यमान थीं ॥ २२-२३ ॥
अथान्तरात् कुमारस्य देवीं दृष्ट्वा महाभुजः ।
पराङ्मुखस्ततो वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ २४ ॥
अपने और कुमारके बीचमें देवीको खड़ी हुई देख महाबाहु मधुसूदनने अपना मुख दूसरी ओर फेर लिया और कहा ॥ २४ ॥
श्रीभगवानुवाच
अपगच्छापगच्छ त्वं धिक् त्वामितिवचोऽब्रवीत्।
किमेवं कुरुषे विघ्नं निश्चितस्य वधं प्रति ॥ २५ ॥
**श्रीभगवान् बोले—**अरी ! हटो ! हटो !! तुम्हें धिक्कार. है। शत्रु का वध करनेके लिये दृढ़ निश्चय किये हुए मेरे उद्देश्यकी सिद्धिमें तुम इस प्रकार विघ्न क्यों डाल रही हो ॥ २५ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वैवं वचनं तस्य कोटवी तु तदा विभोः ।
नैव वासः समाधत्ते कुमारपरिरक्षणात् ॥ २६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन् ! भगवान्की यह बात सुनकर भी कोटवीने उस समय कुमारकी रक्षाके लिये अपने अङ्गोंपर वस्त्र नहीं धारण किया ॥ २६ ॥
श्रीभगवानुवाच
अपवाह्य गुहं शीघ्रमपयाहि रणाजिरात् ।
स्वस्ति ह्येवं भवेदद्य योत्स्यतो योत्स्यता मया ॥ २७ ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**अरी ! तुम कार्तिकेयको शीघ्र हटाकर स्वयं भी समराङ्गणसे दूर चली जाओ, ऐसा करने-पर ही आज मेरे साथ युद्ध करते हुए कार्तिकेयका कल्याण होगा ॥ २७ ॥
तां च दृष्ट्वा स्थितां देवो हरिः संग्राममूर्धनि ।
संजहार ततश्चक्रं भगवान् वासवानुजः ॥ २८ ॥
कोटवीको युद्धके मुहानेपर खड़ी देख इन्द्रके छोटे भाई भगवान् श्रीहरिने अपने चक्रको पीछे लौटा लिया ॥ २८ ॥
एवं कृते तु कृष्णेन देवदेवेन धीमता ।
अपवाह्य गुहं देवी हरसांनिध्यमागता ॥ २९ ॥
देवाधिदेव बुद्धिमान् श्रीकृष्णके ऐसा करनेपर देवी कोटवी कार्तिकेयको वहाँसे हटाकर स्वयं भगवान् शङ्करके समीप चली गयी ॥ २९ ॥
एतस्मिन्नन्तरे चैव वर्तमाने महाभये ।
कुमारे रक्षिते देव्या बाणस्तं देशमाययौ ॥ ३० ॥
इसी बीचमें जब वह महान् भय उपस्थित हुआ और देवीने कुमारकी रक्षा कर ली, तब बाणासुर उस स्थानपर आया ॥
अपयान्तं गुहं दृष्ट्वा मुक्तं कृष्णेन संयुगात् ।
बाणश्चिन्तयते तत्र स्वयं योत्स्यामि माधवम् ॥ ३१ ॥
श्रीकृष्णके हाथोंसे जीवित छूटकर कुमार कार्तिकेय युद्ध-स्थलसे दूर हटे जा रहे हैं, यह देखकर बाणासुरने वहाँ यह निश्चय किया कि मैं स्वयं ही माधवके साथ युद्ध करूँगा ॥
वैशम्पायन उवाच
भूतयक्षगणाश्चैव बाणानीकं च सर्वशः ।
दिशं प्रदुद्रुवुः सर्वे भयमोहितलोचनाः ॥ ३२ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! उस समय भूतों और यक्षोंके समुदाय तथा बाणासुरके समस्त सैनिक भयसे कातर नेत्र होकर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भागने लगे ॥
प्रमाथगणभूयिष्ठे सैन्ये दीर्णे महासुरः ।
निर्जगाम ततो बाणो युद्धायाभिमुखस्त्वरन् ॥ ३३ ॥
जिसमें प्रमथगणोंकी अधिकता थी, उस सेनामें भी दरार पड़ जानेपर बाणासुर युद्धके लिये उत्सुक हो बड़ी उतावलीके साथ निकला ॥ ३३ ॥
भीमप्रहरणैर्घोरैर्दैत्येन्द्रैः सुमहारथैः ।
महाबलैर्महावीर्यैर्वज्रीव सुरसत्तमैः ॥ ३४ ॥
जैसे वज्रधारी इन्द्र श्रेष्ठ देवताओंसे घिरे होते हैं, उसी प्रकार वह भयंकर आयुध धारण करनेवाले, घोर, महाबली, महावीर एवं महारथी दैत्यपतियोंसे घिरा हुआ था ॥ ३४ ॥