भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 254 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 11

[ १० ]

समुद्र पर्यन्त जहाँ कहीं हिन्दू और मुसलमान सेनाओं में मुठभेड़ हुई वहां हार हिन्दुओं को ही हुई। हिन्दुओं की यह पराजय कभी उन के नेता के सहसा गुम हो जाने या मर जाने के कारण होती थी, अथवा कहीं कभी किसी मंत्री अथवा किसी सेनापति के विश्वासघात के कारण। इस प्रकार जब कभी दोटूक युद्ध आरंभ होता तभी वह हिन्दुओं के लिए दुर्भाग्य का कारण ही सिद्ध होता। दाहर के दुर्भाग्य, जयपाल के युद्धों, अनंगपाल की दृढ़ता, पृथिवीराज की अवनति तथा कालिंजर, सांकरी अथवा तालीकोटा की घटनाओं को स्मृतिपट पर लाने से ऊपर कहे हुए तथ्य की सत्यता प्रकट हो जाती है। पर जब शिवा जी ने हमारी जाति के भाग्य को अपने हाथ में लिया तो उस का पासा ही पलट दिया। जो बुरे दिन हिन्दुओं को देखने पड़ते थे वे अब विधर्मियों के सामने आने लगे। इस के पश्चात् हिन्दुओं की ध्वजा को फिर कभी यवनों के हलाली परचम के आगे झुकना नहीं पड़ा। सन् १६०७ के बाद, हिमालय से लेकर समुद्र तक, जहां कहीं हिन्दुओं को मुसलमानों के साथ युद्ध करना पड़ा, वहीं हिन्दू विजयी रहे और मुसलमानों को सदा मुंह की खानी पड़ी, यद्यपि उन की शक्ति हिन्दुओं से दुगुनी-चौगुनी होती थी, और 'उनके अल्ला हो अकबर'-'ईश्वर विजयी हो'-के नारों से आकाश भी गूंज उठता था। इस में कोई सन्देह नहीं कि विजय ईश्वर की ही हुई, पर अब की बार ईश्वर हिन्दुओं का था। सन् १६२७ के पश्चात् ईश्वर हिन्दुओं की ओर सम्मिलित हो गया था-उन हिन्दुओं की ओर जो कि मूर्ति-पूजक थे। अब वह मूर्ति-तोड़ों को घृणा की दृष्टि से देखने लग गया था। इस तथ्य की सत्यता भी सिंहगढ़ की विजय और पावनखण्ड की रक्षा की घटनाओं तथा गुरु गोविन्दसिंह, बंदा बहादुर, छत्रसाल, बाजीरावों, नानासाहिव, भाऊजी, मल्हाररावों, परशुराम पन्त, रणजीतसिंह और अन्य असंख्य मरहठा, राजपूत और सिख सेनापतियों के जीवन-चरित्रों