भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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[ २० ] न्दुओ के हृदय में भर गया, जिससे उनका हृदय उत्साह से उछलने ा। परिणामतः वे अनुभव करने लगे कि जिस अभिप्राय से मरहठे इकर प्राण निछावर कर रहे हैं उसका अस्तित्व केवल भारत और गतवासियों को विदेशियों के दासत्व से मुक्त कराने के लिए ही है। ——— ३. शिवाजी के उत्तराधिकारी सन् १६८० ईस्वी में महाराज शिवाजी का और १६८१ ई० में हात्मा रामदासजी का देहान्त होगया। यद्यपि इन लोगों ने अपने वनकाल में "हिन्दू-पद-पादशाही" के लिये घोर परिश्रम करके बहुत क्र प्राप्त कर लिया था तथापि अभी तक उससे भी अधिक बहुत कुछ प्राप्त ने के लिये शेष पड़ा था। ऐसे अवसर पर उन लोगों की मृत्यु इस न्दोलन के लिये बड़ी ही हानिकारक थी। जो हो, "ईश्वरेच्छा रीयसी !!" यद्यपि उन महापुरुषों के सांसारिक जीवन का अन्त हो गया ापि इन्होंने जिस आन्दोलन को सारे भारत में प्रचलित किया था का अन्त किसी भी अंश में न होने पाया, क्योंकि इस आन्दोलन आधार किसी व्यक्तिविशेष के जीवन पर अवलंबित न था, वरन् की जड़ें राष्ट्रजीवन के गर्भ में गड़ चुकी थीं। यह मरहठों के तहास की एक महत्वपूर्ण विशेषता है, जिसे हम उन पाठकों के चित्त अङ्कित करने का प्रयत्न कर रहे हैं, जो महाराष्ट्र प्रान्त निवासी नहीं । महाराज शिवाजी तथा उनके पूज्य गुरु स्वामी रामदास जी के वनचरित को प्रायः सारे भारतवासी कुछ-न-कुछ अवश्य ही जानते · पर महाराष्ट्र के इतिहास के पिछले भाग से पूर्णतया अनभिज्ञ और यदि किसी अंश में कुछ जानते भी हैं तो उसे निराधार तथा