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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 275 में से

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पृष्ठ 102

हित चौरासी • • ६७ श्रीलालजी कहते हैं- प्यारी जू जब जब देखौं तेरौ मुख, तब तब नयौ नयौ लागत। ऐसी जिय होत कबहुँ मैं न देखी री, दुति कौं दोति न लेखनी न कागत।। अनादि काल से जिस प्रियतमा का मुख दर्शन किया जा रहा है, आज भी वह श्रीलालजी के लिये नया ही है ! और ऐसे दर्शनानन्द में कोटि कोटि कल्प बीतने पर भी तृप्ति नहीं क्योंकि प्रतिक्षण नूतनता है न ! इसी बात को चाचा श्रीहित वृन्दावन दास जी कहते हैं- देखत देखत ओट कोट से होत अनमिले मानैं। ऐसौ प्रेम बली उर खेलै को कवि रीति बखानैं।। कानन कथा अगोचर सबतें प्रेमी ही पहिचानैं। वृंदावन हित रूप न परच्यौ सो अचिरज सो मानैं।। वास्तव में यह बात उसके लिये आश्चर्य पूर्ण ही है जिसने 'हित रूप' का-प्रेम तत्व का किञ्चित् भी परिचय नहीं प्राप्त किया है। इस पुरातन तम प्रेम राज्य की नित्य नवीनता का परिचय आचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद क्या दे रहे हैं, पाठक देखें- नयौ नेह नव रंग, नयौ रस, नवल श्याम वृषभानु किसोरी। नव पीतांबर, नवल चूनरी, नई नई बूँदनि भींजति गोरी।। नव वृंदावन हरित मनोहर नव चातक बोलत मोर मोरी। नव मुरली जु मलार नई गति श्रवन सुनत आये घन घोरी।। नव भूषन नव मुकुट विराजत नई नई उरप लेत थोरी थोरी। (जै श्री) हित हरिवंश असीस देत मुख चिर जीवौ भूतल यह जोरी।। इस पद में बहुत स्पष्ट है कि इस वृन्दावन की प्रत्येक वस्तु नवीन है। यहाँ नेह नया है अतः प्रथम भी है। युगल किशोर सदा सर्वदा अपने प्रेम में नवीनता का अनुभव करते रहते हैं और यही प्रेम का स्वभाव है जैसा कि रसखान जी ने कहा है-

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