हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
DevanagariHindipublished275 पृष्ठ
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१०२ • • हित चौरासी में भी अलग अलग और विशेष भावों की ध्वनियाँ रहती हैं। दूसरे इस प्रकार की आचार्य्यपाद की शैली भी हो सकती है कि जब वे किसी विशेष बात पर जोर देना चाहते हैं या उसका स्पष्टीकरण करना चाहते किंवा पृथकत्व प्रकट करना चाहते हैं तब कुछ ऐसे ही प्रयोग करते हैं। उक्त उदाहरणों में 'चंचल चपल, "भ्रमरनि अलिनु, 'परिरंभन आलिंगन' और 'परिधान वसन पीत पट; कुछ ऐसे ही प्रयोग हैं। इत्यलं ; इस मूल पद में 'चंचल चपल प्रयोग श्रीप्रियाजी के नेत्रों की विशेष चञ्चलता को ही प्रकट करने के लिये है जो एक 'चंचल' या चपल' शब्द से पूर्णता को प्राप्त न हो सकती थी, ऐसा जान पड़ता है।
- २३ - अवतरण-अनेकों बार श्रीप्रियाजी ने अपने एकान्तिक प्रियतम मिलन को हित सखी से छिपाना चाहा जैसा कि पूर्व पदों में वर्णित है किन्तु वह संगोपन हित सखी के समक्ष सर्वत्र विडम्बना ही बन कर रहा-चतुर राधा छिपा न सकी क्योंकि परम चतुरा 'हित' वह छिपतीं भी कैसे ? बात खुल ही जाती रही। आज भी वही अवसर पुनः प्राप्त है। श्रीराधा प्यारी सुरत सङ्गम में विजयी हुई हैं। उनके श्रीअङ्गों में रति श्रम के समस्त लक्षण प्रकट हैं। जिन्हें देखकर हित सखी ने रति विहार की सारी बातें जान ली हैं। वे अन्तर में आनन्द पूरित होकर श्रीराधा से कह रही हैं- धनाश्री मूल- राधा प्यारी तेरे नैन सलोल। तैं निजु भजन कनक तन जोवन, लियौ मनोहर मोल।। अधर निरंग अलक लट छूटी, रंजित पीक कपोल। तूँ रस मगन भई नहिं जानत, ऊपर पीत निचोल।।