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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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हित चौरासी • • १३ चाचा श्रीहित वृन्दावनदास जी रसिक सभा-भूषण द्विजवर-कुल, व्यासनंद-पद सुरतरू रस कौ। भाग्य भलौ जग प्रगट प्रकाश्यौ, किधौं चिन्तामणि राधा-जस कौ॥ परम अलौकिक कामधेनु मनु, दाइक मिथुन गुपत-गुण गंस कौ। वृन्दावन हित रूप जाऊँ बलि, दियौ कर सीस प्रेम पारस कौ॥ को दाता नित्यविहार कौ। श्री हरिवंश उभय रस मूरति बिनु को जग उपकार कौ॥ को वपुरा गुन गुपत कहैगौ वन रस रसिक उदार कौ। को भेदी हिय हिलग मिथुन कौ बिनु उहि परिकर लार कौ॥ जननि भाग कौ उद्भव जानौ कलि वंशी अवतार कौ। वृन्दावन हित जिहिं दत प्रापति कुंज केलि सुख सार कौ॥ श्रीप्रियादास जी रीवाँ जापै कृपा करै श्री हरिवंश सु तापै दयाल सदा हरि राधा। जाकौ नहीं हित सौं हित है टुक ताकी न मेटि सकें हरि बाधा॥ याकौ तौ भेद अनन्य लखैं अरु औरन कौं अति गूढ़ अगाधा। प्रियादास कृपा हित की तें मिल्यौ रस कुंज कौ दर्श पुरी मन साधा॥ श्रीरतनदास जी नमो नमो जै श्री हरिवंश। जुगल मूल रस फूल झूल लगे गौर श्याम हित हेत निसंस॥ नेति नेति रस सबनि जु गायौ खोजत किनहुँ न पाई गंस। करी कृपा वपु प्रेम रूप धरि दियौ दरशाय यह गूढ़ प्रसंस॥ चरण शरण जे हित के अनुसरे तोरि जगत सब माया फंस। सबनि लहे अरु अबहू लहंत हैं नित नवीन यह प्रेम सतंश॥

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