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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 171

हित चौरासी • • १६५ अधर अदन चुंबन परिरंभन, तन पुलकित आनँद रस झेलि।। पट बंधन कंचुकि कुच परसत, कोप कपट निरखत कर पेलि। (जै श्री) हित हरिवंश लाल रस लंपट, धाइ धरत उर बीच सँकेलि।।४९।। भावार्थ-(श्रीहित सखी ने कहा-) "हे सखी ! राधा और उनके प्रियतम की (सम्मिलित) केलि तो देखो ! ये दोनों कुमार (श्रीवन की) गलियों, खिरक एवं गिरि गुहाओं में गल बहियाँ दिये विहार कर रहे हैं। अरी ! ये दोनों नवल किशोर रूप की निधि हैं। (जब ये कंठ भुज देकर मिले हुए चलते हैं तब ऐसे दीखते हैं) मानों तमाल तरु के साथ स्वर्ण की लता लिपट रही हो। अधर पान, चुम्बन एवं परिरम्भण के रस को झेल कर दोनों के तन आनन्द पुलकित हो जाते हैं।" श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं ("जब श्रीलालजी प्यारी के) पट बन्धन, कञ्चुकि एवं कुचों का स्पर्श करते हैं; तब प्यारी (श्रीराधा) उनकी ओर बनावटी क्रोध की मुद्रा से देखतीं और हाथों से उन्हें दूर ढकेल-ठेल देती हैं; उस समय रस लम्पट लाल उन्हें शीघ्रता पूर्वक सँकेल कर अपने हृदय से चिपका लेते हैं।" – ५० – अवतरण-रात्रि का प्रथम प्रहरान्त है। सखियों ने युगल सरकार के शयन की वेला जानकर उन्हें निभृत निकुञ्ज भवन तक पहुँचा दिया है। निकुञ्ज भवन में युगल किशोर अपने करों से कमनीय कोमल कमल दलों की शय्या रचकर उसमें विराज रहे हैं। पश्चात् सुरत केलि का रस भी अवगाहन करते हैं। जिसका वर्णन श्रीहित सजनी इस प्रकार कर रही हैं- सारङ्ग मूल-नवल नागरि नवल नागर किसोर मिलि, कुंज कौंमल कमल दलनि सिज्या रची।