भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 172

१६६ • • हित चौरासी गौर स्यामल अंग रुचिर तापर मिले, सरस मनि नील मनौं मृदुल कंचन खची॥ सुरत नीबी निबंध हेत पिय, मानिनी- प्रिया की भुजनि में कलह मोंहन मची। सुभग श्रीफल उरज पानि परसत, रोष- हुंकार गर्व दृग भंगि भामिनि लची॥ कोक कोटिक रभस रहसि 'हरिवंश हित', विविध कल माधुरी किमपि नाँहिन बची। प्रनयमय रसिक ललितादि लोचन चषक, पिवत मकरंद सुख रासि अंतर सची॥५०॥ भावार्थ-नवल नागरि श्रीराधा एवं नवल नागर किशोर श्याम सुन्दर दोनों ने मिलकर कुञ्ज भवन में कमल के कोमल कोमल दलों से शय्या तैयार की और उस शय्या पर गौर एवं श्याम रुचिराङ्ग इस प्रकार मिल गये जैसे कोमल कञ्चन में सरस नील मणि खचित कर दी गयी हो। सुरत क्रीड़ा के अवसर पर नीबी बन्धन का मोचन करने के लिये प्रियतम तत्पर होते हैं तब मानिनि प्रिया की भुजाओं में (श्याम सुन्दर की बाहुओं के साथ) बड़ी ही मनोहर कलह मचती है। (प्रियतम) प्रिया के सुभग श्रीफल से उरोजों को अपने करों से जब स्पर्श करते हैं तब भामिनि, रोष पूर्ण हुङ्कार, गर्व एवं दृग भङ्गिमा के साथ झुक जातीं अर्थात् अनखा जाती हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि इस ऐकान्तिक आनन्द विलास रूप मिलन में कोटि कोटि कोक की विविध एवं सुन्दर मधुरिमाओं में से कोई एक भी न बचीं—सभी यहाँ पूर्ण हो गयीं। प्रेम मयी रसिक ललिता आदि सखियों ने अपने लोचनों का पान पात्र बनाकर इस रस का पान करते हुए अपने अन्तर (हृदय) में इस सुख की मकरन्द राशि का मानों सञ्चयन करती हैं। – ५१ – अवतरण—श्रीलालजी की चित्तवृत्ति, श्रीप्रियाजी के अनुपम, अद्वितीय रूप लावण्य का दर्शन करके उसी में तन्मय सी हो गयी है। अब वे अपने