हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
DevanagariHindipublished275 पृष्ठ
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१७२ • • हित चौरासी
- ५३ - अवतरण-यद्यपि नारी जाति अबला है किन्तु फिर भी उसके पास एक 'महान् बल है। वह है उसका नारीत्व। जिसके सामने बड़े बड़े बली अपना सिर झुका देते हैं- सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। . ते रतिनाथ सुमन सर मारे।। और- मृगनयनी के नैन सर को अस लागि न जाहि ? इत्यादि वाक्य अबला की बल राशि के ही परिचायक हैं। श्रीराधा अनन्त शक्तिमती होने पर भी हैं तो अन्ततः शृङ्गार रस की गुण गण भूषिता नायिका ही न ? अतः उन्हें 'अबला' नाम से स्वीकार करना पड़ेगा। यह श्रीराधा अनन्त बला होकर भी अबला हैं और अबला के पास वह धनराशि भी है जो अति निरङ्कुश गजराज मोहन श्रीकृष्ण को भी केवल एक केश लट के बन्धन में सर्वदा के लिये बाँध ले सकती है। इस पद में उस बल राशि-अनन्त सौन्दर्य्य का वर्णन बड़ी कुशलता से क्रीड़ा व्याज से किया गया है- मलार मूल- देखौ माई अबला के बल रासि। अति गज मत्त निरंकुस मोंहन; निरखि बँधे लट पासि।। अबहीं पंगु भई मन की गति; बिनु उद्यम अनियास। तबकी कहा कहौं जब प्रिय प्रति; चाहति भृकुटि बिलास।। कच संजमन व्याज भुज दरसति; मुसकनि वदन विकास।