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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

श्रीराधा लेखक के भावोद्गार जाने किस अज्ञात प्रेरणा ने मुझे यह सब लिखने के लिये फिर से बाध्य कर दिया और फल स्वरूप यह गलत-सही 'हित चौरासी' की टीका आज लिख कर पूर्ण हुई। 'तेरे मन कछु और है कर्त्ता के कछु और,' मेरे कुछ प्रेमी वैष्णवों की इच्छा थी कि 'श्रीराधा सुधा निधि' की ही तरह श्रीहित ध्रुवदास जी की समस्त कृतियों का एक संग्रह ग्रन्थ प्रकाशित हो और मैं उस पर शब्दार्थ एवं आवश्यकीय टिप्पणियाँ लिख दूँ प्रेमियों की सद्भावना के अनुसार मैंने उक्त ग्रन्थों (व्यालीस लीला समुच्चय) पर शब्दार्थ एवं टिप्पणियाँ लिखना प्रारम्भ भी कर दिया। कार्यरम्भ करने के कुछ ही दिनों पश्चात् अकस्मात् एक दिन 'हित चौरासी' एवं 'सेवक वाणी' पर भी टीका टिप्पणी लिखने की भावना जागी। मैंने इस भावना को ज्यों ज्यों रोकना प्रारम्भ किया त्यों त्यों यह बलवती होती गयी और प्रारम्भ किए गये कार्य को शिथिल करके इसने अपना कार्य आरम्भ करा लिया। कार्य की प्रगति कहूँ या कुछ और, न कुछ डेढ़ मास में ही 'हित चौरासी' की टीका सम्पूर्ण लिख गयी। ग्रन्थ तो लिख गया किन्तु मेरे मन में बार-बार आता है कि मैंने 'श्रीराधा सुधा निधि की टीका लिखकर रसिक समाज का एक अपराध किया था, और 'हित चौरासी' पर टीका टिप्पणी लिखकर यह दूसरा अपराध है क्योंकि यह लेखन, प्रकाशन के विचार से हुआ है, यों तो बहुत से पूर्वकालीन सन्तों ने इस ग्रन्थ पर टीकायें लिखी हैं किन्तु उनका उद्देश्य निज रसास्वाद था, मेरी तरह लोक ख्याति किंवा व्यापार नहीं। इसके लिये मैं उन रसिक सन्तों, आचार्यों एवं वैष्णवों से क्षमा की भीख माँगता हूँ। मैं इस कार्य में अपराध तो तब मानता हूँ, जब इस विहार रस वृन्दावन विलास को शास्त्रीय शब्दों में गोपनीय स्वीकार करता हूँ और जब यह देखता हूँ कि हमारे पूर्वज रसिकाचार्यों ने जिस वृन्दावन रस को प्रकट किया है वह