हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ • • हित चौरासी
आलिङ्गन दान दें अथवा श्रीप्रियाजी ही उन्हें श्रीलालजी का रतिसुख प्राप्त करने के लिये मानो अपना अधिकार सौंप दें; तो भी इन सब दशाओं में भी सखियाँ श्रीकृष्ण-रस से निर्लिप्त रह कर श्रीराधाचरण रस का ही आस्वादन करती हैं; श्रीहिताचार्य्य पाद कहते हैं- यदि स्नेहाद्राधे दिशसि रति लाम्पट्य पदवीं गतं ते स्वप्रेष्ठं तदपि मम निष्ठं शृणु यथा। कटाक्षैरालोके स्मित सहचरैर्जात पुलकं, समाश्लिष्याम्युच्चैरथ च रसये त्वत्पद रसम्।। -श्रीराधा सुधा निधि श्लो. ८७ अर्थात् "हे राधे ! रति लाम्पट्य पदवी प्राप्त अपने प्रियतम के प्रति जब आप स्नेह वश मुझे सौंप देंगी, तब भी मेरी निष्ठा क्या होगी, उसे सुनिये-मैं मन्द-मन्द मुसकान के साथ तिरछे नेत्रों से प्रियतम की ओर देखूँगी, बस इतने मात्र से ही उनका शरीर पुलकित हो जायगा, पश्चात् मैं उन्हें पुनः एक गाढ़ आलिंगन भी करूँगी जिससे और भी वे प्रेम विह्वल हो जावेंगे किन्तु इतना सब होते हुए भी मुझे आपके रसमय चरण कमलों का ही रसानुभव होगा।" अस्तु; अब यह देखना है कि इस सहचरि भाव की उपासना करने वाले रसिक उपासकों का क्या स्वरूप है; क्योंकि इनका स्वरूप भी सखी के सिद्ध स्वरूप का निदर्शन करता है। श्रीहिताचार्य्य पाद ने अपने रसिक स्वरूप का अनुसन्धान करते हुए लिखा है- प्रथम तो मैं वृन्दारण्य निकुञ्ज मन्दिर में इस प्रकार विलाप करती हुई फिरूँ कि "हे राधे ! मैंने आपको नव सङ्गम के लिये चतुर सङ्केत द्वारा जो मार्ग दिखाया है उस पर न चलोगी क्या ?" तथा आपकी कुच तटी चर्चित कस्तूरी से पङ्किल कालिन्दी सलिल में बारम्बार स्नान करके अपने कुदेह जनित मल को त्याग कर निर्मल हो जाऊँ। तत्पश्चात् आपकी मन भाँवती परिचारिका बनूँ। मैं अपनी स्वामिनी श्रीराधिका के निज कर कमलों द्वारा स्नेह पूर्वक दिये हुए प्रसाद रूप दुकूल एवं कञ्चुकि पट को यथा स्थान दिव्य देह कुचादि में धारण करूँ और सदा स्वामिनीजी के पार्श्व में स्थित रहकर विविध परिचर्याओं में चतुरा किशोरी के रूप में अपने आपको देखूँ। प्रेम विवशाकृति होकर राधाकेलि