हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 93, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ें८८ • • हित चौरासी उनमें क्रमशः भगवदीय, ज्ञान, ऐश्वर्य, माहात्म्य, प्रभुता आदि का लोप हो जाता है। और अन्तिम मधुर भाव में सर्व दोष वर्जित विशुद्ध प्रेम ही प्रेम रह जाता है। यहाँ तक कि भक्ति का लोप कह दें तो अत्युक्ति न होगी। शान्त भाव से दास्य इसलिये श्रेष्ठ है कि दास्य के चित्त में ज्ञान और मुक्ति की स्पृहा मिटकर अनुराग का बीज पाया जाता है। दास भक्त का सर्वस्व अपने प्रभु का होता- प्रभु के लिये होता है। दास से सखा भाव श्रेष्ठ है क्योंकि सखा में दास की अपेक्षा भगवदैश्वर्य ज्ञान का भी अभाव होकर प्रेम का प्राबल्य है। सख्य से वात्सल्य इसलिये श्रेष्ठ है कि माता और पिता को अपना पुत्र जितना प्यारा होता है, सम्भव है मित्र को मित्र, उतना न हो, क्योंकि पुत्र ही पिता या माता की आत्मा है। भगवती श्रुति कहती है- आत्मावै जायते पुत्रः। अर्थात् ("पिता की) आत्मा ही पुत्र रूप में प्रकट होती है।" किन्तु इस वात्सल्य रस में भी सर्व भावेन द्वैत का अभाव नहीं है। पूर्णतया वह उत्सर्ग नहीं जो दाम्पत्य सम्बन्ध में है, जिसे कान्त भाव भी कहते हैं। यही मधुर रस है। इसीमें प्रेम आनन्द, तन्मयता और सर्व दोष वर्जित एकात्मता है। यहाँ ऐश्वर्य नहीं, ज्ञान नहीं, माहात्म्य नहीं, मुक्ति की वासना तक नहीं। है तो केवल प्रेम-सङ्कोच रहित प्रेम ही। इसे देखिये श्रीमद्भागवत दशम स्कन्ध में- मथुरा से उद्धव आये हैं गोपियों के पास श्रीकृष्ण का सन्देश लेकर। चाहते हैं अपनी बात उनसे एकान्त में कहूँ क्योंकि वे सोच रहें हैं कि हैं तो आखिर ये बातें श्रीकृष्ण और गोपियों के प्रणय सम्बन्ध की ही न ! फिर कैसे कही जाय सबके बीच? उनको क्या पता था कि गोपियों ने श्रीकृष्ण के लिये अपनी लोक लाज कुल मर्यादा, मान प्रतिष्ठा, स्वर्ग अपवर्ग, भोग मोक्ष सब छोड़ दिया है। वे श्रीकृष्ण भगवान की भक्त नहीं है। वे हैं नन्द किशोर की प्रणयिनि। वे श्रीकृष्ण के मथुरा पुरी के ऐश्वर्य से कुण्ठित नहीं, वे आज भी उन्हें ब्रज का ग्वाला समझ रही है। अभी भी पूर्व की भाँति वे उन्हें गालियाँ सुना सकती हैं, ताने दे सकती हैं, जो एक प्रेमी के लिये योग्य है।