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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages

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स्थिति को रखते हैं।

प्रथम तीन दिन पूर्व मास का सञ्चित आर्तव प्रवाहित होने लगता है।

चौथे दिन से नया आर्तव बनने लगता है। आर्तव के अति न्यून होने के कारण उस दिन की रात्रि में गर्भ स्थित होने पर इससे पुत्र का जन्म तो होगा, परन्तु वह आर्तव न्यून होने के कारण अल्पायु हो सकता है।

पाँचवें दिन की रात्रि में कन्या, छठे दिन की रात्रि में मध्यम आयु का पुत्र जन्म लेता है।

सातवें दिन की रात्रि में स्त्री के आर्तव में प्रजनन क्षमता के तत्व कम होते हैं। इस प्रकार के आर्तव से उत्पन्न कन्या में बन्ध्या दोष बन जाता है।

आठवें दिन की रात्रि में पुत्र, नवें दिन की रात्रि में कन्या, दसवें दिन की रात्रि में चतुर पुत्र उत्पन्न होता है।

११वीं १३वीं रात्रि में स्त्री का आर्तव अत्यन्त उत्तेजक होता है। इन रात्रियों में स्थापित गर्भ से उत्पन्न कन्या का शरीर अत्यन्त उत्तेजक आर्तव से निर्मित होता है। इसी कारण वह उत्पन्न कन्या अत्यन्त कामुक और विषयी हो जाती है। उसे इस प्रकार के पाप कर्म करने से कोई रोक नहीं सकता। ११वीं १३वीं रात्रि में अधिक उत्तेजक आर्तव के कारण स्त्रियों, उस दिन विषय वासना की अधिक इच्छुक होती हैं। इस होने वाली भयंकर हानि को ध्यान में रखते हुये इस दिन सहवास नहीं करना चाहिये।

बारहवीं और चौदहवीं रात्रि में स्त्री का उत्तेजक और उग्र आर्तव बिलकुल शान्त हो जाता है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। बारहवीं और चौदहवीं रात्रि में उत्तम पुत्र होता है।

१५-१६ रात्रियों में स्थापित गर्भ से संसार को चकित करने वाली दिव्य विभूतियों जन्म लेती हैं। इन दोनों दिनों में स्त्री का आर्तव परिपूर्ण, शुद्ध पवित्र और दोष रहित होता है, इसी कारण

हठयोगप्रकरण, संस्कृत, शिवान Varanasi Collection, Digitized by eGangotri