इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextगर्भाधान
ऋतु समय से १६ दिन तक गर्भाशय का मुख खुला रहता है और उसी समय में गर्भधारण करने की शक्ति उत्पन्न रहती है। इसके पश्चात् गर्भाशय का मुख बन्द हो जाता है जिसके पश्चात् गर्भधारण नहीं हो सकता।
स्थान- कमरा एकांत हो, सुन्दर चित्रों से या जिस विचार का पुत्र या पुत्री के लिए गर्भाधान करना हो, उसी प्रकार के चित्रों से सुसज्जित हो, साफ- सुथरा और सुगन्धित हो, सेज मुलायम गद्देदार हो, कमरे में हल्का प्रकाश हो।
समय- एक प्रहर रात्रि बीते समय से एक प्रहर रात्रि रहे समय तक, अर्थात् रात्रि को १० से १२, १ बजे तक का समय गर्भाधान के लिए उपयुक्त और उत्तम है।
आसन- स्त्री को चारपाई पर सीधे ही लेटकर टांगे घुटने के स्थान से मोड़ कर सीने के पास लगाना चाहिए और पैरों की एड़ियाँ नितम्ब से लगी रहें। इस प्रकार वीर्य ग्रहण करना चाहिए और अपनी कमर के नीचे तकिया भी लगा लेना चाहिये। किसी भी करवट, बैठकर या स्त्री पुरुष के ऊपर लेट कर वीर्य ग्रहण करेगी तो बालक कुछड़ा अंग बिहंग होगा। रजः और वीर्य के पात होते समय स्त्री ऊपर को संकोचन द्वारा वीर्य को खींचे और उस समय स्त्री पुरुष दोनों के मुख के सामने मुख, नासिका के सामने नासिका, नेत्रों के सामने नेत्र, हृदय के साने हृदय, नाभि के सामने नाभि अर्थात् दोनों शरीरों के अंग आम्ने-सामने हों ताकि वीर्य गर्भाशय में सुमन्ता से सीधा ही प्रविष्ट हो जावे। जब दोनों के शरीर तथा भीतरी नाड़ी की चेष्टा शिथिल हो जावे तब दोनों पृथक-पृथक हो जावें। अर्थात् वीर्य स्वलन के कुछ देर पश्चात् पृथक होवें। यदि वीर्य गर्भाशय में प्रविष्ट होते समय जिरह से टेढ़ा इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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