इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextआदि हो जायगा वही अंग बच्चे का विकृत हो जायगा। पुरुष का समागम के पश्चात् लघुशक्ति (मूत्र त्याग) के लिए अवश्य जाना चाहिए और इन्द्र की त्वचा को भी सीधा कर लें।
भोजन-जिस विचार की तथा जितनी विद्वान सन्तान को जन्म देना हो, उसी प्रकार का भोजन पूर्व लिखे अनुसार १॥ मास तक स्त्री पुरुष दोनों ब्रह्मचर्य के साथ सेवन करें। भोजन पाने के कम से कम २ घण्टे पश्चात् समागम करना चाहिए। रति के पश्चात् शतावर ६ माशा, छुहारा २ नग, १॥ पाव दूध १॥ पाव जल इन वस्तुओं को मिलाकर पकायें जब दूध मात्र रह जाये तो उसको ठण्डा करके समागम से पूर्व तैयार करके रख लें और रति से निवृत्त होकर इस दूध का पान करें या मिष्ठान खायें या २॥ तोला बहिया गुड़ भी खा सकते हैं। ऐसा करने से समागम से जा शक्ति क्षय होती है वह पुनः वापिस आ जाती है और कुछ न खाने से आँतों में रूक्षता आ जाती है जिस कारण पेट में विवन्ध हो जाता है।
भावना- समागम के समय स्त्री और पुरुष के जैसे भाव होते हैं, वही भाव सन्तान में अवश्य ही आ जाते हैं। देखा गया है कि माता-पिता तो धर्मात्मा हैं परन्तु उनका लड़का चोर डाकू। ऐसा क्यों? समागम समय में किसी डाकू की घटना याद आ गई और उसे सुनाना आरम्भ कर दिया। इसमें स्त्री के विचारों की अधिक प्रधानता है। इसलिये समागम समय निर्भयता, धार्मिक चित्र, योद्धाओं का ध्यान, शांति, प्रसन्नता, सात्विक विचार होते हैं तो सन्तान उत्तम, विद्वान, निर्भय, बलवान और धर्मात्मा होंगे। इसके विपरीत भावों से दुष्ट, दुराचारी, कुरूप, दरिद्री, पापी और हीन सन्तान होंगे।
एतत्कामफलं लोके यद्व्यापक चिन्तना।
अन्य चित्त कृते कामं शववौरिक संगमः॥
शृंगार शतक २९
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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