इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
Page 137 of 250
Read in contextअर्थ- मंथुन के समय स्त्री पुरुष का चित्त एकाग्रित हो जाना ही काम की सफलता है, यदि उस समय दोनों का चित्त दो स्थानों पर रहा तो समागम में आनन्द नहीं आता।
महाभारत आदिपर्व की गाथा- जिस समय राजा शान्तनु के दोनों पुत्र चित्रवीर्य युवाकाल में और विचित्रवीर्य युद्ध में मारे गये। उस समय रानी सत्यवती को चिन्ता हुई कि वंश वृद्ध कैसे हो, तब उसने नियोग के लिए व्यास जी को बुला कर सन्तान लाभ के लिये प्रार्थना की जिस व्यास जी ने स्वीकार कर लिया। सत्यवती ने सुसज्जित कमरे में घृत का दीपक जलाकर उस कमरे को अम्बिका के लिये नियुक्त किया। जब उस कमरे में व्यास जी ने प्रवेश किया तो अम्बिका ने डर कर ओँखें बन्द कर लीं, व्यास जी ने माता का प्रिय साधने के लिये उसके साथ समागम किया परन्तु काशीराज की कन्या ने भय से उनकी ओर न देखा, अन्तः व्यास जी के घर से निकलने पर उनकी माता ने उनसे पूछा कि बेटा क्या इस वधु से गुणवान पुत्र उत्पन्न होगा? इन्द्रियों के अतीत ज्ञानी सत्यवती के पुत्र व्यास जी ने माता की यह बात सुनकर कहा कि विधि पूर्वक जन्म लिया हुआ गर्भ में यह बालक सहस्र हाथियों के समान बलवान, विद्वान, राजर्षियों में श्रेष्ठ महाभाग, महावीर्यवान अति बुद्धिमान होगा, और वह महात्मा पुत्र उत्पन्न करेगा परन्तु माता दोष के कारण अन्धा होगा। पुत्र की यह बात सुनकर माता ने कहा कि हे तपोवन! अन्धा पुरुष कुल के योग्य भूषण नहीं हो सकता, इसलिए जाति कुल का रक्षक पितरों का वंश रखने वाला और कुरुवंश का राजा होने योग्य एक पुत्र और उत्पन्न करो। महायशस्वी व्यास जी इसे स्वीकार करके चले गये। समय आने पर अम्बिका ने ऋषि के वचनानुसार एक अन्धा पुत्र उत्पन्न हुआ देवी सत्यवती ने पहले की तरह पुत्र वधु की आज्ञा लेकर फिर ऋषि को बुलाया। महर्षि विधि के अनुसार अम्बालिका के पास आये। अम्बालिका उस ऋषि को देख कर पीली पड़ गई।
इच्छानुसार सन्तान १३९ वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri