इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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आचार्य जी का चिर आशीर्वाद
प्रत्येक देश की अपनी एक मौलिक संस्कृति होती है जिसके आधार पर ही उस देश की उन्नति एवं अवन्ति निर्भर रहती है। धर्मप्राण भारतवर्ष ने जहाँ सुसंस्कृत एवं सुव्यवस्थित वर्णश्रम पद्धति द्वारा अपना ऐहलीकिक एवं पारलौकिक जीवन समुन्नत तथा उत्कृष्ट बनाया, वही उसने प्राणी मात्र में सर्वथा श्रेष्ठ मानव के हितार्थ पुरुषार्थ चतुष्टय का विधान कर उसके अनुष्ठान पर पूरा-पूरा बल दिया। धर्मार्थ, काम, मोक्ष, रूप पुरुषार्थ चतुष्टय में धर्म को सर्व प्रथम स्थान दे उससे अनुशासित अर्थ-काम की यथावत् उपलब्धि एवं उपभुक्ति के अनन्तर मोक्ष तक पहुँचने का सरल पथ प्रशस्त बना दिया। पर इसके साथ-साथ भारत के प्राचीन मनीषियों ने यह स्पष्ट घोषणा कर दी-
ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्॥
अर्थात् ऋषि ऋण, देव ऋण तथा पितृ ऋण, इन तीनों ऋणों को चुकाकर ही मोक्ष की ओर प्रवृत्त होना चाहिए। इन तीनों ऋणों में पितृ-ऋण से मुक्ति सुसन्तति के द्वारा ही मिलती है। कवि कुलगुरु कालिदास ने अपने प्रसिद्ध महाकाव्य रघुवंश में लिखा है- न संयतस्तस्य बभूव ऋषितुर्विसर्जयेदयं सुत-जन्म-हर्षितः। ऋणभिधानात् स्वयमेव केवलम् तदा पितृणां मुमुक्षु सन्धननात्॥
अर्थात्- प्रजा रक्षक राजा दिल्लीप के रघु-जन्म के समय कोई बन्दी न था, जिसे पुत्रोत्पत्ति के हर्ष में बन्धन मुक्त कर देता, आँपतू वह स्वयं ही पितृ-ऋण नाम के बन्धन से मुक्त हो गया, शुद्ध वंशज-सन्तति दोनों कुलों का उद्धार कर देती है, और वंश की शुद्ध उत्तम सन्तति पर आश्रित है। अतः वैयक्तिक एवं
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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