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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages

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दिवारक के समान थे। यह सब किसके प्रताप से हुआ। यह ईश्वर से ध्यान लगाने और तप के कारण प्राप्त हुआ। ऐसे ही आर्य समाज के प्रवर्तक परिब्राजकाचार्य श्रीमद्द्वयानन्द सरस्वती भी तप और ईश्वर निष्ठा के कारण ही युग निर्माता ऋषि बने।

किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहिनाम्।

दुष्कूलं चापि विदुषो देवैरपि सुपूज्यते॥

चाणक्य नीति ८/१८

अर्थ- विद्याहीन बड़े कुल से मनुष्यों को क्या लाभ है? विद्वान का नीच कुल भी देवताओं से पूजा जाता है।

इतरा नाम की एक स्त्री थी। (इतरा नाम से सिद्ध होता है कि यह नीच कुल की स्त्री है) उसके पुत्र का नाम महिदास था। वह इतना विद्वान हुआ कि उसने अपनी माता के नाम से एक ग्रन्थ लिखा। जिसका नाम ऐतरेय ब्राह्मण है। जो विद्वानों में पूजित है तथा ऋग्वेद को समझने के लिए प्रारम्भिक सीढ़ी है। विद्या और धर्म को साथ लेकर जो अग्रसर होगा वह निश्चय ही ऊर्ध्व-गति को प्राप्त होगा। मनुष्य शरीर बड़े ही पुण्य कर्मों से प्राप्त होता है, नहीं मालूम कि अगली बार फिर यह शरीर मिले या न मिले।

पुनर्वितं पुनर्मित्रं पुनर्भार्यां पुनर्मीहो।

एतत्सर्वयं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः॥

चाणक्य नीति १४/३

अर्थ- धन, मित्र, स्त्री, पृथ्वी ये सब बार-बार मिलते हैं, परन्तु शरीर फिर-फिर नहीं मिलता। अर्थात् यहाँ योनि मिले व किसी और योनि में जाना पड़े इसका कुछ पता नहीं।

मनुष्य योनि बड़ी ही दुर्लभ है इसमें सब सुकर्म जीव कर सकता है।

किसी भी कार्य को करने से पूर्व यदि कुछ विभागों में विभक्त कर दिया जाए तो वह कार्य सुगमता से पूर्ण हो जाता है।

इच्छानुसार मन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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