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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages

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शरीर को चलाने के लिए परमात्मा ने शरीर के चार भाग किये हैं। जिसे वेद में वर्ण के नाम से कहा है।

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीदाह्म राजन्यः कृतः।

ऊरु तदस्य यद्वैश्यः पदुभ्यां शुद्रो अजायत॥

ब्रह्मवेद १०/१०/१२

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र यह चार भाग हैं। शरीर में ब्राह्मण सिर है, जो बुद्धि द्वारा सारे शरीर से सत्य कर्म को करता है। क्षत्रिय भुजाओं और वक्षस्थल को कहते हैं जो सारे शरीर की रक्षा का भार अपने ऊपर लिए हुए हैं। वैश्य पेट को कहते हैं, जो भोजन का रस रक्त बनाकर सारे शरीर को विभाजित कर देता है। शुद्र पैरों को कहते हैं, जो सारे शरीर को समस्त स्थानों का भ्रमण करता है। विचार कर ब्राह्मण मुख भोजन खाता है। क्षत्रिय हाथ उसे खिलाता है और मुख उस भोजन को अपने ही पास न रखकर वैश्य रूपी पेट के पास भेज देता है और वैश्य पेट उसे अपने पास न रखकर उसका रस रक्त बनाकर समस्त अंगों को बाँट देता है और शुद्र पैर तीनों वर्णों की सेवा करता हुआ भ्रमण करता है। वेद ने एक छोटे से सूत्र में सारी राष्ट्रियता भर दी। जिस शरीर में, राज्य में, परिवार में इसी प्रणाली से कार्य चलेगा वह धर्म, धन और यश को अवश्य ही प्राप्त करेगा।

न विप्रपादोदककर्दमनि,

न वेद शास्त्र ध्वनिर्गजितानि।

स्वाहा स्वधाकारविवर्जितानि,

शमशानतुल्यानि गृहाणितानि॥

चाणक्य नीति १२/९

अर्थ- जहाँ ब्राह्मण के पगों के जल से न कींचड़ हुई, न वेद शास्त्र के शब्दों की गर्जना, जो स्वाहा स्वाध्याय स्वधा से रहित हों, ऐसे घर शमशान के समान हैं। अर्थात् धर्म कर्म रहित

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri