इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्नान
गुणा-दश स्नान परस्य साधौ,
रूपंच तेजश्च बलश्च शौचम्।
आयुष्यं मारोग्यमलोलुपत्वं,
दुःस्वप्न नाशश्च यशश्च मेधा॥
अर्थ- स्नान से रूप, तेज, बल, शौच, आयु, आरोग्यता, यश तथा धारणवती बुद्धि बढ़ती है। मल और स्वप्न दोष का नाश होता है।
स्नान से बुद्धि ठीक रहती है शरीर हल्का होता है भोजन और कार्य में रुचि बढ़ती है पूजनदि में ध्यान लगता है, शरीर की कान्ति सुन्दर होती है, शरीर सुखील और दृढ़ होता है स्नान से अनेक रोगों को दूर किया जा सकता है। सबसे उत्तम स्थान स्नान के लिए नदी या सालाब है। स्नान सदैव ताजे ठंडे जल से करना चाहिए। सिर पर गर्म जल डालने से कोश शीघ्र पंक जाता है, नेत्रों की ज्योति मन्द पड़ जाती है, स्मरण शक्ति निर्बल हो जाती है। गर्म जल में ठंडा जल मिलाना विष रूप हो जाता है ऐसे जल को कभी प्रयोग में नहीं लाना चाहिए।
न संहताभ्यां पाणिभ्यां कराडुयेदात्मनः शिरः।
न स्पृशेच्छैतदुच्छिष्टो न चस्नायाहिना ततः॥
अर्थ- दोनों हाथों से एक साथ अपना सिर न खुजोवे और झूठे हाथों से सिर न छुए और बिना सिर पर जल डाले स्नान न करे।
तेल मर्दन के पश्चात् बैसन का उबटन करके स्नान करना उत्तम है। भोजन पाने के पश्चात् स्नान करना मन्दारिन
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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