इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंमाता अपना सब कुछ पुत्रों को ही दे देती है। वह अपने लिए कुछ भी नहीं रखती, तो यह कैसे हो सकता है कि माता वसुंधरा एक याजक की दी हुई हवि को अपने पास रख सके। वह माता वसुंधरा भी उसे अपने पास नहीं रखती वह सबका अनुकरण करती है। वह लहराती हुई वनस्पति को करतल ध्वनि में इदन्मम का सन्देश सुना-सुना कर अपने पुत्रों के अर्पण कर देती है। इसी प्रकार गौ उस वनस्पति को चर कर अपने स्तनों से इदन्मम के नाद के साथ दूध की धारा यज्ञ में चढ़ाती हैं और हम मानव भी पूर्व की भांति इदन्मम का गान करते हुए यज्ञ में हवि चढ़ाते हैं। यही क्रम प्रतिक्षण पुनः पुनः चक्राकार में इदन्मम के गान का चलता रहता है।
इसलिए जो अग्निहोत्र हवन करता है वह सम्पूर्ण प्रजा का पालन करता है।
सूर्य अपनी किरणों द्वारा निरन्तर सब जगत के रस, गन्ध, दुर्गन्ध आदि को ऊपर खींचता रहता है। पुष्यादि की सुगन्ध, दुर्गन्ध का निवारण करती रहती है। जब सुगन्ध और दुर्गन्ध दोनों के समान परमाणु सूर्य की किरणों द्वारा ब्रह्माण्ड में पहुँच कर वायु को मध्यम कोटि का बना देते हैं, उस मध्यम कोटि के वायु से मध्यम कोटि की जल वृष्टि होती है और मध्यम कोटि की जल वृष्टि से अन्न और वनस्पति आदि भी मध्यम कोटि के होते हैं। उस अन्न से मनुष्यों के शरीर बल, वीर्य, बुद्धि, पराक्रम, धैर्य और शूरवीरतादि गुण भी मध्यम कोटि के होते हैं। क्योंकि जिसका जैसा कारण होता है वैसा ही उसका कार्य। इसी प्रकार जब मनुष्य अपने सुख लाभ के कारण अनेक प्रकार से दुर्गन्ध बढ़ाने वाले कार्य करता है, जैसे धूमपान, नवीन-नवीन प्रकार के कल-कारखाने जिसके द्वारा विषाक्त धूम उत्पन्न होता है वह सब वायु को अधिक दुर्गन्ध युक्त करके निकृष्ट बना देता है जिसका फल यह होता है कि उस निकृष्ट वायु से जल वृष्टि
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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