जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ १८ ] विषय पृष्ठ १९५ पब्बत्तूपत्थर जातक २८६ [ राजा की रानी को उसके आमात्य ने दूषित कर दिया। राजा ने विचार कर दोनो को क्षमा कर दिया। ] १९६ वालाहस्स जातक २९१ [ यक्षिणियां व्यापारियो को फँसाकर यक्ष नगर ले जाती। पाँच सौ व्यापारी उनके चगुल म फँस गए। ज्येष्ठ व्यापारी को पता लगा कि यह यक्षिणियाँ हैं। उसने सब को भाग चलने को कहा। ढाई सौ व्यापारी ज्येष्ठ व्यापारी का कहना मान बच निकले। कहना न मानने वाले दो ढाई सौ व्यापारी यक्षिणियो के आहार बने । ] १९७ मित्तामित्त जातक २९५ [ मित्र या अमित्र कैसे पहचाना जा सकता है ? ] १९८ राध जातक २९७ [ पोट्ठपाद ने ब्राह्मणी को दुराचार से विरत रहने का उपदेश दिया। उसने विचारे तोते की गरदन मरोड उसे चूल्हे में फेंक दिया। ] १९९ गहपति जातक ३०० [ ब्राह्मणी और गाँव का मुखिया मिलकर ब्राह्मण को धोखा देना चाहते थे। वे अपने दुराचार को न छिपा सके। ] २०० साधुसील जातक ३०३ [ एक ब्राह्मण की चार लडकियां थी। उसने आचार्य से पूछा—लड़कियाँ किसे देना योग्य है ? ] ६. नतंदळ्ह वर्ग ३०६ २०१ बन्धनागार जातक ३०६ [ पुत्र दारा का बन्धन सब से बडा बन्धन है । ]