जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४० [ २ । १५१ हुए चार अगत्तियों¹ से बचकर दस राजधर्मों से विरुद्ध न जा धर्मानुसार राज्य करते हुए स्वर्ग-मार्ग को भरनेवाले हुए। इतना कह राजा के प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व उसकी पटरानी की कोख में रह गर्भ की सम्यक् रक्षा होने पर माता की कोख से बाहर निकले। नाम-करण के दिन उसका नाम ब्रह्मदत्तकुमार ही रक्खा गया। क्रम से बढ़ते हुए सोलह वर्ष की आयु होने पर वह तक्षशिला जाकर सब शिल्पों में निष्णात हो पिता के मरने पर राजा हो धर्म से तथा न्याय से राज्य करने लगा। राग आदि के वशीभूत न हो वह मुकद्दमो का फैसला करता। उसके धर्म से राज्य करने से आमात्य भी धर्म से ही व्यवहारो (=मुकद्दमो) का फैसला करते। मुकद्दमो का धर्म से फैसला होने के कारण झूठे मुकद्दमे करनेवाले भी नही रहे। उनके न होने से राजाङ्गण में मुकद्दमे करनेवालो का शोर नही होता था। आमात्य सारा दिन न्यायालय में बैठे रहकर भी जब किसी को मुकद्दमा लिए आता न देखते तो उठकर चले जाते। न्यायालय खाली कर देने योग्य हो गए। बोधिसत्त्व सोचने लग कि मेरे धर्मानुसार राज्य करने के कारण मुकद्दमा करने वाले नही आते। शोर नही होता। न्यायालय छोड़ने योग्य हो गए। अब मुझे अपने दुर्गुणो की खोज करनी चाहिए। जब मुझे यह पता लग जाएगा कि यह यह मेरे दुर्गुण है तो उन्ह छोड़कर गुणवान बनकर ही रहूँगा। उसके बाद से वह खोजने लगे कि कोई मेरे दोष कहने वाला है ? उस महल के अन्दर कोई ऐसा नही मिला जो उनके दोष कहे। जो मिला प्रशसा करने वाला ही मिला। 'यह मेरे भय से भी केवल मेरी प्रशंसा ही करते होगे' सोच महल के बाहर रहने वाला की परीक्षा की। यहाँ भी कोई न मिला, तो नगर के अन्दर खोज की। नगर के बाहर चारो दरवाजा पर स्थित गाँवो में ¹छन्द, द्वेष, भय तथा मोह के वशीभूत हो पक्षपात करना।