भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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१४४ [ २ । १५२ १५२. सिगाल जातक “असमेक्खित कम्मन्त....” यह शास्ता ने कूटागार शाला में रहते समय वैशाली निवासी एक नाई के लड़के के बारे में कही— क. वर्तमान कथा उसका पिता राजाओ, रानियो, राजकुमारो तथा राजकुमारियो की हजामत बनाता, केश ठीक करता, शतरज¹ बिछाता तथा और भी सभी कार्य्य करता था। वह श्रद्धावान था। उसने बुद्ध धर्म तथा सघ की शरण गही थी। वह पञ्चशीलो की रक्षा करता था। बीच बीच में वह शास्ता का धर्मोपदेश सुनता हुआ, अपना समय व्यतीत करता था। एक दिन वह राजा के यहाँ काम करने जाते समय अपने पुत्र को साथ ले गया। पुत्र ने वहाँ एक देवप्सरा सदृश सजी हुई लिच्छवि कुमारी को देखा। वह उस पर आसक्त हो गया। पिता के साथ राजभवन से लौटने पर उसने कहा कि यह कुमारी मिलेगी तो बचूँगा, नही तो यही मेरा मरण होगा। इतना कह वह खाना पीना छोड़ चारपाई पर पड रहा। उसके पिता ने पास आकर कहा—तात ¹ अनधिकार इच्छा मत कर। तू नाई का लडका है। तेरी जाति छोटी है। लिच्छवि कुमारी क्षत्री की लडकी है। ऊँची जाति वाली। वह तेरे लिए योग्य नही है। तेरे लिए तेरी समान जाति और गोत्र की कोई दूसरी लडकी ला दूँगा। उसने पिता का कहना नहीं माना। उसके माता, भाई, बहन, चाची, चाचा ¹ दोनो ओर आठ आठ मोहरों के स्थान होने से शतरंज का पुराना नाम अट्ठपद है।