भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

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१४८ [ २.१.१५

[ सिंह ने सिंह नाद से गुफा को गुंजा दिया । गुफा मे रहने वाले सियार जब सिंह की आवाज सुनी तो वह डर कर त्रास को प्राप्त हुआ और उसका हृद फट गया । ] '

सीहो, सिंह चार प्रकार के होते हैं (१) तृण-सिंह (२) पाण्डु-सिंह (३) बाळ-सिंह (४) लाल हाथ पैर वाला केसरी । उनमें से यहाँ केसरी सिंह से ही मतलब है । दद्दरं अभिनादयि सौ बिजलियो के शब्द से भी भयानक सिंहनाद से उस रजत पर्वत को निनादित कर दिया, गुंजा दिया । यद्वरे बसं स्फटिक मिले रजत पर्वत पर रहते हुए । भीतो सन्तासमापादि मृत्यु-भय से डरकर चित्त-त्रास को प्राप्त हुआ । हृदयं चस्स अप्फलि, उस भय से उसका हृदय फट गया ।

इस प्रकार सिंह उस सियार का प्राणान्त कर, भाइयो को एक जगह छिपाकर बहन को उनके मरने का वृत्तान्त कह, उसे दिलासा दे जन्म भर काञ्चन गुफा में ही रह कर्मानुसार परलोक सिधारा । शास्ता ने यह धर्म-देशना ला आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्यों का प्रकाशन हो चुकने पर उपासक श्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय सियार नाई का लडका था । सिंह-बच्ची लिच्छवि-कुमारी, छ छोटे भाई कोई स्थविर हुए । ज्येष्ठ-भ्राता सिंह तो मैं ही था ।

१५३. सूकर जातक "चतुप्पदो अहं सम्म...." यह गाथा ने जेतवन में विहर करते समय एक बूढ़े स्थविर के बारे में कही ।