भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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मोर ] १७७ पर्वत-शृंखला में एक दण्डक-हिरण्य पर्वत के नीचे रहना शुरू किया। रात्रि का प्रभात होने पर वह पर्वत के शिखर पर बैठ, उगते सूर्य्य को देख अपने घूमने फिरने की जगह को सुरक्षित करने के लिए ब्रह्म (महान्-) मन्त्र बनाता हुआ यह कहता— उदेतयं चक्खुमा एकराजा हरिस्सवण्णो पठविप्पभासो तं तं नमस्सामि हरिस्सवण्णं पठविप्पभासं तयज्ज गुत्ता विहरेमु दिवसं ॥ [ यह चक्षुमान एक राजा जिसका रंग सुनहरी है और जो पृथ्वी को प्रका- शित करता है उदय हो रहा है। मैं इस पृथ्वी को प्रकाशित करने वाले, सुवर्ण वर्ण को नमस्कार करता हूँ। आज इसके द्वारा रक्षित होकर दिन में घूमें।] उदेति, प्राचीन लोकधातु से ऊपर उठता है। चक्खुमा, सारे ब्रह्माण्ड के निवासियो के अन्धकार को दूर कर आँख प्राप्त कराने से वह जिस आँख का देने वाला हुआ उसी आँख वाला होने से चक्खुमा। एकराजा, सारे चक्रवाल में प्रकाश फैलाने वालो में सर्वश्रेष्ठ होने से एकराजा। हरिसवण्णो, हरि जैसा रंग, अर्थात् स्वर्ण वर्ण। पठवि को प्रकाशित करता है, इस लिए पठविप्प- भासो। तं तं नमस्सामि, इसलिए ऐसे उन्हें नमस्कार करता हूँ, वन्दना करता हूँ। तयज्जगुत्ता विहरेमु दिवस, उससे सुरक्षित होकर, उसकी हिफाजत में हम आज का दिन सुखपूर्वक उठ बैठ चल फिर कर गुजारें। इस प्रकार बोधिसत्त्व इस गाथा से सूर्य्य को नमस्कार कर इस दूसरी गाथा से अतीत काल के परिनिर्वाण को प्राप्त हुए बुद्धो तथा बुद्ध-गुणो को स्मरण करते— ये ब्राह्मणा वेदगु सब्ब धम्मे ते मे नमो ते च मं पालयन्तु नमत्थु बुद्धान नमत्थु बोधिया नमो विमुत्तानं नमो विमुत्तिया इमं सो परित्तं कत्वा मोरो चरति एसना ॥ १२