जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमोर ] १८१ खाकर अजर अमर होने की इच्छा से तुझे पकड़वाया है ?" "महाराज ! मेरा मास खाने वाले तो अमर हो, और मुझे मरना होगा ?" "हाँ, मरना होगा ।" "जब मैं मरूँगा, तो मेरा मास खाने वाले किस लिए नहीं मरेंगे ?" "तू सुनहरी रंग का है, इसलिए तेरा मास खाने वाले अजर अमर होंगे।" "महाराज ! मैं यूँ ही सुनहरी रंग का पैदा नहीं हुआ हूँ । पहले मैं इसी नगर में चक्रवर्ती राजा था । मैने अपने आप भी पांच शीलो की रक्षा की और सारे चक्रवाल के निवासियो से भी करवाई । मर कर मैं त्रयोत्रिंश लोक म पैदा हुआ । वहाँ आयु भर रह कर एक दूसरे पापकर्म के फलस्वरूप मोर होकर पैदा हुआ, लेकिन पुराने सदाचार के प्रताप से सुनहरी रंग का हुआ ।" "तू चक्रवर्ती होकर (पच-) शील की रक्षा कर उसी के फलस्वरूप सुन- हरी रंग का हुआ, इस बात पर हम कैसे विश्वास करें ? तेरा कोई साक्षी है ?" "महाराज ! है ।" "कौन है ?" "महाराज ! जब मैं चक्रवर्ती था, तो रत्नमय रथ में बैठ कर आकाश में विचरता था । वह मेरा रथ मङ्गल-पुष्करिणी के अन्दर जमीन में गड़वाया हुआ है । उसे मङ्गल पुष्करिणी से निकलवाये । वह रथ मेरे कथन का साक्षी होगा ।" राजा ने 'अच्छा' कह स्वीकार कर पुष्करिणी मे से पानी निकलवा रथ को बाहर करवाया । तब उसे बोधिसत्त्व की बात पर विश्वास हुआ । बोधिसत्त्व ने राजा को धर्म उपदेश दिया—"महाराज ! अमृत महा निर्वाण को छोड़ शेष जितने भी सस्कृत धर्म हैं, वे सब पैदा होकर अभाव को प्राप्त होते हैं, अनित्य हैं, क्षय होने वाले हैं, व्यय होने वाले हैं।" फिर राजा को पच-शील में प्रतिष्ठित किया । राजा ने प्रसन्न हो बोधिसत्त्व की राज्य से पूजा की और बड़ा सत्कार किया । उसने राज्य राजा को ही वापिस लौटा कुछ दिन रह कर राजा को उपदेश दिया कि महाराज ! अप्रमादी रह । फिर आकाश में उड़कर दण्डक हिरण्य नाम के पर्वत को ही चला गया।