जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८२ [ २.१.१६० राजा भी बोधिसत्त्व के उपदेशानुसार चल दान आदि पुण्य कर्म कर कर्मानुसार परलोक सिधारा। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर उद्विग्न-चित्त भिक्षु अर्हत्व में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय राजा आनन्द था। सुनहरी रंग का मोर तो मैं ही था।
१६०. विनीलक जातक
“एवमेव मून राजान...” यह शास्ता ने वेळुवन में रहते समय देवदत्त के बुद्ध की नकल करने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
जब देवदत्त गया-शीर्ष पर गए हुए दोनो प्रधान श्रावको के सामने बुद्ध का रंग-ढंग बनाकर लेट रहा, तो दोनो स्थविर धर्मोपदेश दे अपने शिष्यो को लेकर वेळुवन चले आए। शास्ता ने पूछा-“सारिपुत्त ! तुम्हें देखकर देवदत्त ने क्या किया ?” “भन्ते ! सुगत का रंग-ढंग दिखाकर महाविनाश को प्राप्त हुआ।” “सारिपुत्त ! न केवल अभी देवदत्त मेरी नकल करके विनाश को प्राप्त हुआ है, पहले भी प्राप्त हुआ है”। इतना कह पूर्वजन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में विदेह राष्ट्र में मिथिला में विदेहराज के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व उसकी पटरानी की कोख से पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला