जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबेरी ] ५ ख. अतीत कथा पूर्व समय में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व महासम्पत्ति- शाली सेठ होकर पैदा हुआ। एक गांव में निमन्त्रण खाकर लौटने समय रास्ते में चोरो को देख वहीं नहीं ठहरा। जल्दी जल्दी बैलो को हाँक, अपने घर ही आकर नाना प्रकार के श्रेष्ठरसो से युक्त भोजन करके महाशय्या पर (लेटा। उस समय 'चोरो के हाथ से निकलकर भयरहित स्थान अपने घरपर आ गया हूँ' सोच, उल्लासपूर्वक यह गाथा कही— यत्थ वेरी निवसति न वसे तत्थ पण्डितो, एकरत्तं द्विरत्तं वा दुक्खं वसति वेरिसु ॥ [जहाँ पर वैरी का निवास हो, पण्डित आदमी को चाहिये कि वहाँ निवास न करे। क्योकि वैरी के साथ एक या दो रात्रि रहनेवाला भी दुःख ही भोगता है।] ────── वेरी, वैर-भाव से युक्त आदमी। निवसति, प्रतिष्ठित रहता है। न वसे तत्थ पण्डितो, जहाँ वह वैरी आदमी प्रतिष्ठित होकर रहता है, पाण्डित्य से युक्त पण्डित-जन को चाहिये कि वहाँ न रहे। किस कारण से ? एकरत्तं द्विरत्त वा दुक्ख वसति वेरिसु, वैरियों के बीच में (केवल) एक या दो दिन रहता हुआ भी दुःख ही भोगता है। ────── बोधिसत्त्व इस प्रकार हर्ष ध्वनि करके दान-यादि पुण्य-धर्म कर यथाकर्म (परलोक) सिधारे। शास्ता ने इस धर्म-देशना को ला, जातक का मेल बैठाया कि उस समय मैं ही वाराणसी का सेठ था।