जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदुब्बलकट्ठ ] ७ चतुब्भि अट्ठज्झगमा, समुद्र मे चार परियो ( विमान प्रेतनीयो ) को पाकर, उन से सन्तुष्ट न हो, लोभ के कारण और आठ को प्राप्त किया। शेष दो पदो का अर्थ भी इसी प्रकार है। अतिच्छ चक्कम्रासदो इस प्रकार स्वकीय लाभ से असन्तुष्ट इस इस चीज की प्राप्ति होने पर, और और चीज की इच्छा करते हुए, अब इस उर-चक्र को प्राप्त हुए। उसके इस प्रकार इच्छाहातस्स पोसस्स तृष्णा से प्रताडित तेरे चक्क भमति मत्थके, पत्थर तथा लोहे के दो प्रकार के चक्रो मे से तेज धार वाला लोहे का चक्र, फिर फिर उसके माथे पर गिरने से ऐसा कहा गया। यह कहकर (बोधिसत्व) स्वय देवलोक को गये। वह नरकगामी प्राणी भी अपने पापकर्मो के क्षीण होने पर कर्मानुसार अवस्था को प्राप्त हुआ। शास्ता ने इस धर्म-देशना को ला जातक का मेल बैठाया—उस समय मित्र-विन्दक (अब का) दुर्भागीभिक्षु था, और देवपुत्र तो मैं ही था। १०५. दुब्बलकट्ठ जातक “बहुम्पेतं वने कट्ठ” आदि शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक भय- भीत भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा वह श्रावस्ती-निवासी, तरुण, शास्ता का धर्मोपदेश सुन, प्रव्रजित हो मरने से भयभीत रहता था। रात या दिन मे हवा के चलने पर, सूखी-डण्ठलो के गिरने पर तथा पक्षिया या चौपायो के कुछ शब्द करने पर, मरण-भय से डरकर वह जोर से चिल्लाता हुआ भागता। 'मुझे भी मरना होगा', इसका उसे ध्यान तक न था। यदि वह यह जानता कि “मै मरूँगा” तो उसे मरने