जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८ [ १.११-१०५ से डर न लगता। वह मरण-स्मृति योग-विधि (=कर्मस्थान) का अन- भ्यासी होने से ही डरता था। उसकी मृत्युभय से भयभीत होने की बात भिक्षु- संघ को पता लग गई। सो एक दिन भिक्षुओं ने धर्म-सभा में बात चलाई —आयुष्मन्तो ! अमुक मरण-भीरु भिक्षु मृत्यु से डरता है। भिक्षु को तो चाहिये कि वह 'मुझे अवश्य ही मरना है' इस मरण-स्मृति कर्मस्थान की भावना करे। शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ ! इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "यह बातचीत कहने पर भगवान् ने उस भिक्षु को बुलवाया और पूछा—क्या तुझे सचमुच मरने से डर लगता है ? "भन्ते ! सचमुच !" "भिक्षुओ ! इस भिक्षु से असन्तुष्ट मत होओ। यह भिक्षु केवल अब ही मरने से भयभीत नहीं है, पहले भी भय भीत ही रहा है। वह पूर्वजन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय, बोधिसत्त्व हिमालय में वृक्ष-देवता की योनि में उत्पन्न हुए। उस समय वाराणसी- नरेश ने हस्ति-शिक्षकों को अपना हाथी दिया था ताकि वे उसे निर्भय बनाव। उन्होंने भाले ले, हाथी को पक्की तरह से खूंटे से बांध, उसे घर उसका डर निकालना शुरू किया। इस पीडा को न सह सकने के कारण हाथी ने खूंटा तुड़ा, मनुष्यों को भगा, स्वयं हिमालय में प्रवेश किया। आदमी उसको न पकड़ सकने के कारण वापिस लौट आये। हाथी को वहाँ मरण भय लग गया। वायु के शब्द को सुनकर, कांपता हुआ, मरने के भय से भय-भीत अपनी सूंड को धुनता हुआ जोर से भागता। इसको ऐसा लगता था जैसे खूंटे पर बाँध कर मारा जा रहा हो। शरीर-सुख वा मानसिकसुख एक भी नहीं मिलता था। कांपता हुआ भटकता था। वृक्ष-देवता ने यह देखकर वृक्ष- की शाखा पर खड़े होकर यह गाथा कही— बहुम्पेत्थ वने कट्ठं वातो भञ्जति दुब्बलं, तस्स चे भायसि नाग ! किसो नून भविस्ससि ॥