जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८ [ १.११.१०६ राजा, राजा के महामन्त्री आदि, और तो और द्वारपाल तक आकर शास्ता को प्रणाम कर उस महादरिद्री से कहने लगे—"भो ! सौ लेकर, दो सौ लेकर या पांच सौ लेकर हमारा भी हिस्सा रक्खो ।" उसने 'शास्ता से पूछकर जाऊंगा' सोच शास्ता के पास जाकर यह बात कही । शास्ता ने उत्तर दिया "धन लेकर या बिना लिये जैसे भी हो सब प्राणियो को हिस्सेदार बनाओ । उसने धन लेना प्रारम्भ किया। मनुष्यो ने दुगुना, चौगुना, आठ गुना आदि दे देकर नौ करोड सोना दिया । शास्ता दानानुमोदन कर विहार चले गये । फिर भिक्षुओं के अपना अपना कर्त्तव्य करने पर शास्ता ने उन्हें उपदेश दे गन्धकुटी मे प्रवेश किया । शाम को राजा ने उस महादरिद्री को बुलवाया और श्रेष्ठी बना उसका सत्कार किया। धर्म-सभा मे भिक्षुओ ने बातचीत चलाई—"आयुष्मानो ! महान् दरिद्री के दिये हुए पूए, शास्ता ने बिना घृणा प्रगट किये ऐसे खाये जैसे अमृत । महान् दरिद्री भी बहुत सा धन और सेठ का पद प्राप्त कर बहुत सम्पत्तिशाली हो गया । शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ ! बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "अमुक बातचीत" कहने पर 'भिक्षुओ ! न केवल अभी मैने बिना घृणा दिखाये उसके पूए खाये बल्कि पहले जब मै वृक्ष-देवता था तब भी खाये थे" कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय म वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य के समय बोधिसत्व अरण्डी के एक वृक्ष पर वृक्ष-देवता होकर पैदा हुए । उस गांवडे के मनुष्य तब देवता- विश्वासी¹ थे । एक त्योहार आने पर उन्होने अपने अपने वृक्ष-देवताओ को बलि दी । एक दरिद्री मनुष्य ने लोगो को वृक्ष-देवताओ की सेवा करते देख स्वय एक अरण्ड-वृक्ष की सेवा की । मनुष्य अपने अपने देवताओ के लिये
¹देवता मङ्गलिका, जिनका विश्वास हो कि देवताओ की पूजा करने से कल्याण होगा ।