जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचुल्लनन्दिय ] ३७६ बोधिसत्त्व ने कहा—मा, हम तुम्हे मधुर फल भेजते है। तुम किसलिए कुम्हला रही हो ? "तात ! मुझे नही मिलते।" बोधिसत्त्व ने सोचा—यदि मै दल की नेतागिरी करता रहा तो माता मर जाएगी। मै दल को छोड माता की ही सेवा करूँगा। उसने चुल्लनन्दिय को बुलाकर कहा—तात ! तू दल की नेतागिरी कर। मैं माता की सेवा करूँगा। उसने भी अपने भाई से कहा—मुझे दल की नेतागिरी से काम नही। मै भी माता की ही सेवा करूँगा। वे दोनो एकमन हो दल को त्याग, माता को ले हिमवन्त को छोड़ सीमान्त में न्यग्रोध-वृक्ष के नीचे रहते हुए माता की सेवा करने लगे। एक वाराणसी-वासी ब्राह्मण-विद्यार्थी ने तक्षशिला में सर्वप्रसिद्ध आचार्य्य के पास सब विद्यायें ग्रहण कर पूछा—अब में जाऊँ ? आचार्य्य ने विद्या के प्रताप से उसका कठोर, परुष तथा दुस्साहसी स्वभाव जान 'तात ! तू कठोर, 'परुष तथा दुत्साहसी हैं। ऐसे लोगो को सब समय एक सा ही नही होता। महा-विनाश, महा-दुख को प्राप्त होते है। तू कठोर मत हो। ऐसा काम मत कर जिससे पीछे पछताना पड़े' उपदेश दे विदा किया। उसने आचार्य्य को प्रणाम कर, वाराणसी पहुँच, घर बसा सोचा कि मैं किसी दूसरे शिल्प से जीविका न चला सकूँगा। इसलिए मैं धनुष के सिरे से जीवित रहूँगा। मै शिकारी का काम कर जीविका चलाऊँगा। वह वारा- णसी से निकल सीमान्त के गाँव मे रहते हुए धनुष-तरकस बाँध, जगल में जा नाना प्रकार के पशुओ का मार मास बेचकर जीविका चलाने लगा। एक दिन उसे जगल में कुछ नही मिला। घर लौटते हुए उसने खुले मैदान के एक सिरे पर एक वट-वृक्ष देखा। शायद यहाँ कुछ मिले सोच वह वट-वृक्ष की ओर गया। उसी समय दोनो भाई माँ को फल खिला उसे आगे करके वृक्ष के नीचे बैठे थे। जब उन्होने उस शिकारी को आते देखा, तो सोचा कि हमारी मा को देखकर भी क्या करेगा ? वे स्वय शाखाओ के बीच मे छिप गए। उस निर्दयी आदमी न भी वृक्ष के नीचे पहुँच, उनकी उस बुढापे से दुर्बल अन्धी माँ को देख