जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकुण्डकपूव ] १६ नाना प्रकार के माला, गन्ध, लेपन आदि और खाद्य-भोज्य लेकर गये । लेकिन यह ले गया भूरे के पूए और कड्छी में पानी। अरण्ड-वृक्ष के समीप पहुँचा तो सोचने लगा—"देवता दिव्य-भोजन करते हैं। मेरे देवता यह घूरे का पूआ नहीं खायेंगे। इसे व्यर्थ क्यों नष्ट करें ? मैं ही इसे खा लूँगा।" यह सोच वहीं से लौट पड़ा। बोधिसत्त्व ने वृक्ष की शाखा पर खड़े होकर कहा—"भो ! यदि तुम धनी होते तो मुझे मधुर खाजा देते, लेकिन तुम दरिद्र हो। मैं तुम्हारा पूआ न खाकर और क्या खाऊँगा ? मेरे हिस्से को नष्ट न करो।" इतना कह यह गाथा कही— ययन्नो पुरिसो होति तथन्ना तस्स देवता, आहरेतं फणं पूर्व मा मे भागं विनासय ॥ [ जैसा आदमी, वैसा देवता । इस घूरे के पूए को ला । मेरे हिस्से को नष्ट मत कर।] ─── ययन्नो, जैसा भोजन, तथन्ना, उस आदमी का देवता भी वैसे ही भोजन का खानेवाला होता है। आहरेत फणं पूवं—इस घूरे के पके पूए को ला । मेरे हिस्से को नष्ट न कर । उसने वापिस लौट बोधिसत्त्व को देख बलि दी। बोधिसत्त्व ने उसमें से सार ग्रहणकर पूछा—"भले आदमी ! तू किस लिये मेरी सेवा करता है ?" "स्वामी ! मैं दरिद्र हूँ। चाहता हूँ कि दरिद्रता से मुक्त हो जाऊँ । इसी लिये सेवा करता हूँ।" "भले आदमी ! चिन्ता मत कर। तूने जो सेवा की है वह कृतज्ञ की, कृत-उपकार को न भूलनेवाले की की है। इस अरण्ड के चारो ओर खजाने से भरे घडे गर्दन से गर्दन मिलाकर रक्खे हैं। तू राजाको कह, गाड़ियों में धन लदवाकर राजाङ्गण में डलवा। राजा प्रसन्न होकर तुझे श्रेष्ठी का पद दे देगा।" यह कहकर बोधिसत्त्व अन्तर्धान हो गये। उसने वैसा ही किया। राजा