जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextअसिताभू ] ४१५ ख. अतीत कथा पूर्व समय मे वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ऋषियो के क्रम से प्रव्रजित हो अभिञ्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर हिमालय प्रदेश मे रहने लगे। उस समय वाराणसी नरेश ने यह देख कि उसके पुत्र ब्रह्मदत्त कुमार के साथ बहुत लोग है उससे आशङ्का होने के कारण उसे राष्ट्र से बाहर करवा दिया। वह असिताभू नामक अपनी देवी को साथ ले, हिमालय म प्रविष्ट हो मछली, मास, फलमूल खाता हुआ पर्णशाला मे रहने लगा। एक किन्नरी को देख, उसके प्रति आसक्त हो उसने सोचा कि इसे अपनी भार्या बनाऊँगा और असिताभू का ख्याल न कर उसके पीछे पीछे गया। उसने उसे किन्नरी के पीछे जाता देख सोचा यह मुझे छोड किन्नरी के पीछे जाता है, मुझे इससे क्या ? उसने उसके प्रति विरक्त हो बोधिसत्त्व के पास जा, प्रणाम कर, अपने योग्य कसिम पूछ, कसिम की भावना कर अभिञ्ञा और समापत्तियाँ प्राप्त कीं। फिर बोधिसत्त्व को प्रणाम कर आकर स्वयं पर्ण- शाला-द्वार पर खडी हुई। ब्रह्मदत्त भी किन्नरी का पीछा करता हुआ घूमता रहा। उसे उसके जाने का मार्ग तक न दिखाई दिया। यह निराश होकर पर्णशाला के सामने आया। असिताभू ने उसे आते देख आकाश मे उठ, मणि वर्ण के गगनतल मे खडी हो 'आर्यपुत्र ! तेरे कारण मुझे यह ध्यान सुख प्राप्त हुआ' कह पहली गाथा कही— त्वमेवदानिमकर य कामो व्यगमा तथि, सो य अप्पटिसन्धिको खरा छिन्नव रेचक ॥ [ यह जो तेरे प्रति आसक्ति जाती रही, यह अब तून ही किया है। आरी से कटे हाथीदाँत की तरह यह अब जुड नही सकती । ] त्वमेवदानिमकर आर्यपुत्र ! मुझे छोड किन्नरी का पीछा करते हुए तूने ही यह किया है। य कामो व्यगमा तपि जो मेरी तेरे प्रति आसक्ति जाती रही, विष्कम्भन-प्रहाण द्वारा प्रहीण हो गई, जिसके प्रहीण होने से मुझ यह विशेष अवस्था प्राप्त हुई। सोय अप्पटिसन्धिको_वह आसक्ति अब बिना जुड सकने वाली हो गई, फिर जोडी नही जा सकती। खरा छिन्नव रेचक