जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
ख. अतीत कथा
असिताभू ] ४१५ ख. अतीत कथा पूर्व समय मे वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ऋषियो के क्रम से प्रव्रजित हो अभिञ्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर हिमालय प्रदेश मे रहने लगे। उस समय वाराणसी नरेश ने यह देख कि उसके पुत्र ब्रह्मदत्त कुमार के साथ बहुत लोग है उससे आशङ्का होने के कारण उसे राष्ट्र से बाहर करवा दिया। वह असिताभू नामक अपनी देवी को साथ ले, हिमालय म प्रविष्ट हो मछली, मास, फलमूल खाता हुआ पर्णशाला मे रहने लगा। एक किन्नरी को देख, उसके प्रति आसक्त हो उसने सोचा कि इसे अपनी भार्या बनाऊँगा और असिताभू का ख्याल न कर उसके पीछे पीछे गया। उसने उसे किन्नरी के पीछे जाता देख सोचा यह मुझे छोड किन्नरी के पीछे जाता है, मुझे इससे क्या ? उसने उसके प्रति विरक्त हो बोधिसत्त्व के पास जा, प्रणाम कर, अपने योग्य कसिम पूछ, कसिम की भावना कर अभिञ्ञा और समापत्तियाँ प्राप्त कीं। फिर बोधिसत्त्व को प्रणाम कर आकर स्वयं पर्ण- शाला-द्वार पर खडी हुई। ब्रह्मदत्त भी किन्नरी का पीछा करता हुआ घूमता रहा। उसे उसके जाने का मार्ग तक न दिखाई दिया। यह निराश होकर पर्णशाला के सामने आया। असिताभू ने उसे आते देख आकाश मे उठ, मणि वर्ण के गगनतल मे खडी हो 'आर्यपुत्र ! तेरे कारण मुझे यह ध्यान सुख प्राप्त हुआ' कह पहली गाथा कही— त्वमेवदानिमकर य कामो व्यगमा तथि, सो य अप्पटिसन्धिको खरा छिन्नव रेचक ॥ [ यह जो तेरे प्रति आसक्ति जाती रही, यह अब तून ही किया है। आरी से कटे हाथीदाँत की तरह यह अब जुड नही सकती । ] त्वमेवदानिमकर आर्यपुत्र ! मुझे छोड किन्नरी का पीछा करते हुए तूने ही यह किया है। य कामो व्यगमा तपि जो मेरी तेरे प्रति आसक्ति जाती रही, विष्कम्भन-प्रहाण द्वारा प्रहीण हो गई, जिसके प्रहीण होने से मुझ यह विशेष अवस्था प्राप्त हुई। सोय अप्पटिसन्धिको_वह आसक्ति अब बिना जुड सकने वाली हो गई, फिर जोडी नही जा सकती। खरा छिन्नव रेचक
४१६ [ २.६२३४ रार कहते हैं आरी को और रेरुव कहते हैं हाथीदांत को। जैसे आरी से कटा हुआ हाथीदांत फिर जुड़ नहीं सकता, फिर पहले की तरह से नहीं मिलता। इसी प्रकार मेरा तेरे साथ फिर चित्त का संयोग नहीं हो सकता। ——— यह कह उसने देखते हुए ही ऊपर उठकर दूसरी जगह चली गई। उसने उसके जाने पर रोते हुए दूसरी गाथा कही— अतिच्छदा अतिलोभेन अतिलोभमदेन च, एव हायति अत्थम्हा अहंव असिताभुया ॥ [ जहाँ तहाँ इच्छा करने से, अति लोभ से तथा अति लोभमद से आदमी उसी प्रकार अपने लाभ को गँवा देता है जैसे मैंने असिताभू को।] ——— अतिच्छदा अतिलोभेन अतिच्छा कहते हैं जहाँ तहाँ पैदा होने वाली असीम तृष्णा को। अतिलोभ कहते हैं सीमा लाँघने वाले लोभ को। अतिलोभमदेन च पुनः मद पैदा होने से अतिलोभ मद हो गया। भावार्थ यह है कि जहाँ तहाँ इच्छा करने वाला आदमी अतिलोभ से तथा अतिलोभमद से अहं व असिताभुया जैसे मैं असिताभू राजकन्या से जुदा हो गया वैसे वह अपने लाभ को गँवा देता है।
२३५. वच्छनख जातक
वच्छनख ] ४१७ २३५. वच्छनख जातक “सुखा घरा वच्छनख .” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय रोजमल्ल के बारे मे कही। क. वर्तमान कथा यह आयुष्मन् आनन्द का गृहस्थी-काल का मित्र था। उसने एक दिन स्थविर के पास आने के लिए सन्देश भेजा। स्थविर शास्ता से आज्ञा लेकर गए। उसने स्थविर को नाना प्रकार के बढ़िया भोजन खिला, एक ओर बैठ, स्थविर के साथ कुशल क्षेम बतियाते हुए स्थविर को गृहस्थ-भोगो तथा पाँच विषयो का निमन्त्रण दिया। वह बोला—भन्ते आनन्द ! मेरे घर मे बहुत सी जडचेतन सम्पत्ति है। इसे बीच मे से आधी बाँटकर तुम्हे देता हूँ। आएँ दोनो घर में रहें। स्थविर ने उसे कामभोगो के दुष्परिणाम कहे और आसन से उठकर विहार चले गए। शास्ता ने पूछा—आनन्द ! तूने रोज को देखा ? “हाँ, भन्ते ।” “उसे क्या कहा ?” “भन्ते ! मुझे रोज गृहस्थ होने का निमन्त्रण देता था। मैने उसे गृहस्थ जीवन के तथा विषयो के दोष बताए।” शास्ता ने कहा—आनन्द ! रोजमल्ल केवल अभी प्रव्रजितो को गृहस्थ होने का निमन्त्रण नही देता। इसने पहले भी निमन्त्रण दिया है। उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही— २७
ख. अतीत कथा
४१८ [ २.६.२३५ ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व एक निगम-ग्राम में किसी ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो हिमालय में रहने लगे। वहाँ चिरकाल तक रहकर नमक-खटाई खाने के लिए वाराणसी पहुँच, राजा के बाग में रह, अगले दिन वाराणसी मे प्रवेश किया। वाराणसी का सेठ उनकी चालढाल से प्रसन्न हुआ। उसने उन्हें घर ले जाकर भोजन खिलाया। फिर उद्यान में रहने का वचन ले सेवा करते हुए उद्यान में बसाया। उनमें परस्पर स्नेह पैदा हो गया । बोधिसत्त्व के प्रति प्रेम और विश्वास होने के कारण वाराणसी-सेठ एक दिन इस प्रकार सोचने लगा—प्रव्रजित रहना दुष्कर है। मैं अपने मित्र वच्छनख परिव्राजक को गृहस्थ बना सारा धन बीच में से आधा आधा बाँट कर उसे दे दूँ। दोनो मिलकर रहें। उसने एक दिन भोजन के अनन्तर उसके साथ मधुर बातचीत करते हुए कहा—'भन्ते वच्छनख ! प्रव्रजित रहना दु ख है। गृहस्थ रहने में सुख है। आएं दोनो मिलकर विषयो का भोग करते हुए रहें।' यह कह पहली गाथा कही— सुखा घरा वच्छनख सहिरञ्जा सभोजना, यत्थ भुत्वा च पीत्वा च सयेय्याय अनुस्सुको ॥ [ वच्छनख ! सोने और खाद्य पदार्थों से भरपूर घर सुख-कर हैं, जहाँ खा पीकर आदमी निश्चिन्त सोता है।] सहिरञ्जा सात रत्नो से युक्त। सभोजना बहुत खाद्य भोज्य पदार्थों से युक्त। यत्थ भुत्वा च पीत्वा च जिन सोने और भोजनो से युक्त घरो में नाना प्रकार के बढ़िया भोजन खाकर और नाना प्रकार के पान पीकर । सयेय्याय अनुस्सुको जिन (घरो) में अलंकृत शयनासनो पर निश्चित होकर सोएगा, उससे घर बहुत ही सुखकर हैं।
वच्छनख ] ४१६ उसकी बात सुन बोधिसत्त्व ने कहा—सेठ ! तू अज्ञान के कारण काम- भोगों में आसक्त होकर गृहस्थी का गुण और प्रव्रज्या का अवगुण कह रहा है। अब तू सुन, मैं गृहस्थी के दोष बताता हूँ। यह कह दूसरी गाथा कही— घरा नानीहमानस्स घरा नाभणतो मुसा, घरा नाछिन्नदण्डस्स परेसं अनिकुब्बतो; एव छिद्दं दुरभिभवं को घरं पटिपज्जति ॥ [ (नित्य) मेहनत न करने वाले की गृहस्थी नहीं चलती। झूठ न बोलने वाले की गृहस्थी नहीं चलती। दूसरा को न ठगते हुए की गृहस्थी नहीं चलती। दण्डत्यागी की गृहस्थी नहीं चलती। इस प्रकार की छिद्रों से पूर्ण, मुश्किल से चलने वाली गृहस्थी को कौन करता है।] घरा नानीहमानस्स नित्य कृषि गोरक्षा आदि करने में परिश्रम न करने वाले की गृहस्थी नहीं (चलती)। गृहस्थी स्थिर नहीं होती। घरा नाभणतो मुसा खेत, वस्तु, हिरण्य, स्वर्ण आदि के लिए झूठ न बोलने वाले की भी गृहस्थी नहीं। घरा नाछिन्नदण्डस्स परेसं अनिकुब्बतो जिसने दण्ड नहीं लिया, जिसने दण्ड ग्रहण नहीं किया, जिसने दण्ड रख दिया वैसे दूसरा को न ठगने वाले की भी गृहस्थी नहीं। जो दण्डधारी होकर दूसरों के दासों तथा नौकर चाकर आदि को उस उस अपराध के लिए अपराध के अनुसार वध करना, बाँधना, (अङ्ग-) छेद करना, ताडना आदि करता है उसीकी गृहस्थी ठहरती है। एव छिद्दं दुरभिभवं को घरं पटिपज्जति सो अब इस प्रकार डाग आदि के न करने पर अनेक हानियां होने के कारण छिद्रपूर्ण, करने पर नित्य ही करना पड़ने के कारण कठिन, मुश्किल से निभने वाली, नित्य करने पर भी दुरभि- सम्भव तथा मुश्किल से पूरा पडने वाले घर को मैं चिन्ता-रहित होकर करूँगा ? (ऐसा बोलकर) गृहस्थी को कौन करे ? इस प्रकार बोधिसत्त्व गृहस्थी के दोष कह उद्यान ही चले गए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय बाराणसी-सेठ रोजमल्ल था। वच्छनख परिव्राजक तो मैं ही था।
२३६. बक जातक
४२० [ २६.२३६ २३६. बक जातक “भद्दको वतयं पक्खी..” ” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते हुए एक ढोगी के बारे मे कही। उसे लाए जाने पर शास्ता ने देखकर कहा-भिक्षुओ, यह न केवल अभी ढोगी है, यह पहले भी ढोगी रहा है। और पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय मे बाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व हिमालय प्रदेश के एक तालाब मे बडे परिवार सहित मच्छ होकर रहते थे। मच्छो को खाने की इच्छा से एक बगुला तालाब के पास सिर गिरा कर तथा पंखो को पसार कर मछलियो की प्रमादावस्था को धीरे धीरे देखता हुआ खडा था। उसी समय मच्छो के समूह से घिरे हुए बोधिसत्त्व शिकार पकडते पकडते वहाँ पहुँचे। मच्छो के गण ने उस बगुले को देख पहली गाया कही- भद्दको वतय पक्खी द्विजो कुमुदसन्निभो, वूपसन्तेहि पक्खेहि मन्द ऽमन्दोव झायति ॥ [ कुमुद सदृश यह पक्षी बहुत अच्छा है। शान्त परो से यह शनै. शनै ध्यान करता है।] मन्दमन्दोव झायति असक्त की तरह से, कुछ न जानता हुआ सा अकेला ही ध्यान करता है। उसे देख बोधिसत्त्व ने दूसरी गाया कही-
साकेत ] ४२१ नास्स सीलं विजानाय अनञ्ञाय पसंसय, अम्हे द्विजो न पालेति तेन पक्खी न फन्दति ॥ [इसके स्वभाव को नहीं जानते। बिना जाने प्रशंसा करते हो। यह पक्षी हमारी रक्षा नहीं करता। इसीलिए पर नहीं फड़फड़ाता।] अनञ्ञाय—न जानकर। अम्हे द्विजो न पालेति यह पक्षी हमारी रक्षा नहीं करता, हमें नहीं सँभालता। यह सोचता है कि मैं इनमें से किसे खाऊँगा। तेन पक्खी न फन्दति इसीसे पक्षी न फड़फड़ाता है, न चलता है। ऐसा कहने पर मच्छों के समूह ने पानी में क्षोभ पैदा करके बगुले को भगा दिया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय बगुला (यह) ढोंगी था। मच्छराज तो मैं ही था। २३७. साकेत जातक "को नु खो भगवा हेतु . '" यह शास्ता ने साकेत के समीप विहार करते समय साकेत ब्राह्मण के बारे म कही। अतीत कथा और वर्तमान कथा भी एकक निपात (पहले परिच्छेद) की पूर्वोक्त साकेत जातक¹ में आ ही चुकी है। हाँ, तथागत के विहार जाने पर भिक्षुओं ने पूछा—भन्ते ! यह स्नेह कैसे स्थापित हो जाता है ? यह पूछते हुए उन्होंने पहली गाथा कही— ¹साकेत जातक (१.७ ६८)
४२२ [ २.६.२३७ को नु खो भगवा हेतु एकच्चं इध पुग्गले, अतीव हृदयं निब्बाति चित्तञ्चापि पसीदति ॥ [ भगवान् ! इसका क्या कारण है कि किसी किसी आदमी के प्रति हृदय अति ठण्डा हो जाता है और चित्त प्रसन्न हो जाता है । ] अर्थ—इसका क्या कारण है कि किसी किसी आदमी को देखते ही हृदय अति ठण्डा हो जाता है, सुगन्धित शीतल जल के हजारो घड़ो से सींचे हुए की तरह शीतल हो जाता है; किसी के प्रति नही होता ? किसी को देखते ही चित्त प्रसन्न हो जाता है, कोमल पड जाता है, प्रेम से जुड जाता है, किसीसे नही जुडता ? शास्ता ने उन्हें प्रेम का कारण बताते हुए दूसरी गाथा कही— पुब्बेव सन्निवासेन पच्चुप्पन्नहितेन वा, एव तं जायते पेमं उप्पलंव यथोदके ॥ [ पूर्व जन्म के सम्बन्ध से वा इस जन्म के उपकार से प्रेम पैदा होता है जैसे जल में कमल । ] भिक्षुओ, प्रेम इन दो कारणो से ही पैदा होता है। पूर्व जन्म में चाहे माता, चाहे पिता, चाहे पुत्री, चाहे पुत्र, चाहे भाई, चाहे बहिन, चाहे पति, चाहे भार्या, चाहे सहायक, चाहे मित्र होकर जो कोई जिस किसी के साथ एक स्थान मे रहता है उससे इस पुब्बेव सन्निवासेन वा दूसरे जन्म में भी वह स्नेह नही छूटता । इस जन्म मे किए गए पच्चुप्पन्नहितेन वा एवं तं जायते पेमं । इन दो कारणो से प्रेम पैदा होता है। जैसे क्या ? उप्पलंव यथोदके 'व' का ह्रस्व कर दिया। समुच्चय अर्थ मे ही इस का प्रयोग है। इसलिए उत्पल तथा जल मे पैदा होने वाले शेष जितने भी पुष्प है ये दो ही कारणो से पैदा होते हैं—जल से और गारे से। उसी प्रकार इन दो ही कारणो से प्रेम पैदा होता है।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय के
। एकपद ] ४२३ शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय के ब्राह्मण और ब्राह्मणी यही दो जन थे। पुत्र तो मैं ही था। २३८. एकपद जातक "इङ्ग एकपदं तात . " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक कौटुम्बिक के बारे में कही। क. वर्तमान-कथा यह कौटुम्बिक श्रावस्ती निवासी था। एक दिन गोद में बैठे हुए पुत्र ने अर्थ का द्वार नामक प्रश्न पूछा। उसने सोचा यह प्रश्न बुद्ध का ही विषय है। इसका उत्तर अन्य कोई नहीं दे सकेगा। वह पुत्र को लेकर जेतवन गया और शास्ता को प्रणाम करके कहा—भन्ते ! इस बालक ने गोद में बैठे बैठे अर्थ का द्वार प्रश्न पूछा है। मैं उसको नहीं जानता था। इसलिए यहाँ आया हूँ। भन्ते ! इस प्रश्न को कहें। शास्ता ने कहा—"उपासक ! यह बालक केवल अभी अर्थ की खोज करने वाला नहीं है। इसने पहले भी अर्थ-खोजी होकर पण्डितों से यह प्रश्न पूछा है। पुराने पण्डितों ने इसे यह कहा भी है। किन्तु जन्मान्तर की बात होने से अब इसे उसका ध्यान नहीं।" इतना कह उसके प्रार्थना करने पर पूर्व जन्म की बात कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ने सेठ के कुल में पैदा हो, बड़े होने पर पिता के मरने के बाद सेठ का स्थान
४२४ [ २.६ २३८ ग्रहण किया। उसके पुत्र ने जब वह बच्चा ही था गोदी में बैठे बैठे पूछा— तात ! मुझे अनेक़ार्थ वाला एक कारण, एक बात कहें। यह पूछते हुए उसने यह गाथा कही— इङ्घ एकपदं तात अनेकत्थपदनिस्सितं, किञ्चि सङ्ग्राहिकं ब्रूहि येनत्थे साधयामसे ॥ [तात ! अनेक अर्थपदो से युक्त कोई एक सङ्ग्राहक पद कहें, जिससे अर्थ की प्राप्ति हो।] इङ्घ याचना के या प्रेरणा के अर्थ में निपात है। एकपदं एक पद वा एक बात से युक्त पद। अनेकत्थपदनिस्सितं अनेक अर्थों वा बातो से युक्त। किञ्चि सङ्ग्राहिकं ब्रूहि कोई एक बहुत से पदो का सङ्ग्राहक पद कहें। अथवा यही पाठ है। येनत्थे साधयामसे जिस अनेक़ार्थ युक्त एक पद से ही हम अपनी वृद्धि सिद्ध करे, वह हमे कहें—यही पूछता है। उसके पिता ने कहते हुए दूसरी गाथा कही— दक्खेय्येकपदं तात अनेकत्थपदनिस्सितं, तञ्च सीलेन संयुत्तं खन्तिया उपपादितं; अलं मित्ते सुखापेतुं अमितानं दुखाय च ॥ [तात ! दक्षता अनेक अर्थपदो से युक्त एक पद है। वह शील और क्षमा के सहित हो तो मित्रो को सुख तथा शत्रुओं को दुख देने के लिए पर्याप्त है।] दक्खेय्येकपदं दक्षता एक पद है। दक्षता कहते हैं लाभ उत्पन्न करने वाले, हुशियार कुशल आदमी का ज्ञानपूर्ण प्रयत्न (=वीर्य्य)। अनेकत्थपद निस्सितं इस प्रकार कहा गया वीर्य्य अनेक अर्थ पदो से युक्त। किससे ? शीलादि से। इसलिए तञ्च सीलेन संयुत्तं आदि कहा। उसका अर्थ है कि वह वीर्य्य आचारशील तथा सहनशक्ति से युक्त। मित्ते सुखापेतुं अमितानञ्च दुखाय अलं, समर्थ है। कौन है जो लाभ उत्पन्न करने वाले, ज्ञानपूर्ण कुशल
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक
हरितमात ] ४२५ वीर्य से युक्त हो, आचार-शील तथा क्षमा से युक्त हो और मित्रो को सुख देने तथा शत्रुओं को दुख देने में समर्थ न हो ? इस प्रकार बोधिसत्त्व ने पुत्र के प्रश्न का उत्तर दिया। वह भी पिता के कथनानुसार अपनी उन्नति कर यथाकर्म परलोक गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों के प्रकाशन के अन्त मे पिता पुत्र सोतापत्ति फल मे प्रतिष्ठित हुए। उस समय पुत्र यही था। बाराणसी सेठ तो मैं ही था। २३६. हरितमात जातक “आसिविस मम सन्त ” यह शास्ता ने वेळुवन म रहते समय अजातशत्रु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा कोशलराज के पिता महाकोशल ने राजा बिम्बिसार को अपनी लडकी देने के समय लडकी का स्नान-मूल्य काशीगांव दिया। अजातशत्रु द्वारा पिता मार दिए जाने से वह राजा के प्रति स्नेह होने के कारण शीघ्र ही मर गई। माता के मर जाने पर भी अजातशत्रु उस गांव का उपभोग करता ही था। कोशलराज उससे लडता था कि मैं पिता की हत्या करने वाले चोर को अपने कुल का गांव न दूंगा। कभी मामा विजयी होता, कभी भानजा। जब अजातशत्रु जीतता तब रथ पर ध्वजा बँधवा बडी शान के साथ नगर मे प्रवेश करता। जब पराजित होता तब दुखी मन से चुपचाप बिना किसी को खबर किए प्रवेश करता।
कथा कही—
४२६ [ २६२ ] ६ एक दिन भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो, अजात- शत्रु मामा को हराकर प्रसन्न होता है, हारने पर चिन्तित होता है। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—"भिक्षुओ, केवल अभी नहीं, यह पहले भी जीतने पर प्रसन्न होता था, हारने पर दुखी होता था।" इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व नीले मेण्डक होकर पैदा हुए। उस समय मनुष्यों ने नदी कन्दरा आदि में जहाँ तहाँ मछलियाँ पकड़ने के लिए जाल¹ फैलाए थे। एक जाल में बहुत सी मछ्- लियाँ दाखिल हुईं। एक जल-सर्प भी मछलियाँ खाता हुआ उसी जाल में फँसा। बहुत सी मछलियो ने इकट्ठे हो उसे खा लहू-लहान कर दिया। जब उसे कही शरण न दिखाई दी तो मृत्यु से भयभीत हो वह जाल से निकल वेदना से बेहोश हो पानी के किनारे जा पडा। नील मेण्डक भी उस समय उछल कर जाल के सिरे पर आ पडा था। सर्प को कोई दूसरा निर्णायक न दिखाई दिया तो उसने उस मेण्डक को वहाँ पड़े देख पूछा—'सौम्य नील मेण्डक ! क्या तुझे इन मछलियो की यह करतूत अच्छी लगती है ?' उसने यह पहली गाथा कही— आसीविसं ममं सन्तं पविट्ठं कुभिनामुखं, रुच्चते हरितामाता यं मं खादन्ति मच्छका ॥ [ हे हरी माता वाले ! यह जो जाल में दाखिल होने पर मुझ सर्प को मछलियाँ खाती हैं, क्या यह तुझे अच्छा लगता है ? ] आसिविसं ममं सन्तं मुझ सर्प को। रुच्चते हरितामाता यं मं खादन्ति मच्छका कहता है कि हे हरे मेण्डकपुत्र क्या यह तुझे अच्छा लगता है ? ¹मछलियाँ पकड़ने का बाँस का फंदा।
हरितमात ] ४२७ हरे मेण्डक ने उत्तर दिया—हां, मित्र अच्छा लगता है। किस कारण से ? यदि तू अपने प्रदेश मे आने पर मछलियो को खाता है तो मछलियाँ भी तुझे अपने प्रदेश में आने पर खाती है। अपने अपने प्रदेश में, विषय मे, गोचर भूमि मे कोई कमजोर नही होता। यह कहकर दूसरी गाथा कही— विलुम्पतेव पुरिसो यावस्स उपकप्पति, यदा चञ्ञे विलुम्पन्ति सो विलुत्तो विलुम्पति ॥ [ जब तक सामर्थ्य होती है आदमी (दूसरो) को लूटता ही है। जब दूसरे लूटते है, तो वह लूटने वाला लुटता है। ] विलुम्पतेव पुरिसो यावस्स उपकप्पति जब तक पुरुष का ऐश्वर्य रहता है तब तक वह दूसरो को लूटता ही है। याव सो उपकप्पति यह भी पाठ है। जितने समय तक वह आदमी लूट सकता है, अर्थ है। यदा चञ्ञे विलुम्पन्ति जब दूसरे ऐश्वर्य्यशाली होकर लूटते है। सो विलुत्तो विलुम्पति वह लुटेरा लूटा जाता है। विलुम्पते भी पाठ है। अर्थ यही है। विलुम्पन भी पढते हैं। उसका अर्थ ठीक नही बैठता। इस प्रकार लूटने वाला फिर लूटा जाता है। वोधिसत्व के मुकद्दमे का निर्णय देने पर मछलियो ने जल-सर्प की दुर्बलता जान, शत्रु को धर पकडने के लिए जाल से निकल उसे वही मार डाला और चली गईं। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय जल- सर्प अजातशत्रु था। नील मेण्डक तो में ही था।
२४०. महापिङ्गल जातक
४२८ [ २.६ २४० २४०. महापिङ्गल जातक “सब्बो जनो ..” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय देवदत्त के बारे में कही। क. वर्तमान कथा देवदत्त के शास्ता के प्रति बैर बांध लेने के नौ महीने बाद जेतवन के द्वार-कोठे पर (उसके) पृथ्वी द्वारा निगल लिए जाने पर जेतवनवासी तथा सकल नगर के निवासी यह सोच कि बुद्ध के मार्ग का कण्टक देवदत्त पृथ्वी के द्वारा निगल लिया गया और अब सम्यक सम्बुद्ध का शत्रु मर गया बड़े सन्तुष्ट हुए। उनसे परम्परा-घोष¹ से सुनकर सारे जम्बूद्वीपवासी तथा यक्ष भूत और देवगण भी बड़े हर्षित हुए। एक दिन भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो, देवदत्त के पृथ्वी द्वारा निगल लिए जाने पर महा-जन-समूह यह सोचकर कि बुद्ध का विरोधी देवदत्त पृथ्वी द्वारा निगल लिया गया हर्षित हुआ। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त के मरने पर जन- समूह हर्षित होता है और प्रसन्न होता है, पहले भी हर्षित हुआ है और प्रसन्न हुआ है।" इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में महापिङ्गल नाम का राजा अधर्म से, अनुचित ¹एक से दूसरा और फिर उससे तीसरा सुने।
महापिङ्गल ] ४२६ तौर पर राज्य करता था। छन्द आदि के वशीभूत हो पापकर्म करता हुआ दण्डबलि जङ्घ-कार्षापण आदि ले जनता को ऐसे पीडता था जैसे ऊख-यन्त्र ऊख को। वह रौद्र स्वभाव का था, कठोर था और दुस्साहसी था। उसमें दूसरो के लिए तनिक भी दया नही थी। घर मे स्त्रियो या, लडके लडकियो का, अमात्य ब्राह्मणो का तथा गृहपति आदि का भी अप्रिय था। वह ऐसा था मानो आँख में धल हो, भात के कौर मे ककर हो अथवा ऐडी को बीध कर काँटा घुस गया हो। उस समय बोधिसत्त्व महापिङ्गल का पुत्र होकर पैदा हुए। महापिङ्गल चिरकाल तक राज्य करके मर गया। उसके मरने पर सभी वाराणसी वासियो ने हर्षित हो, सन्तुष्ट हो, खूब प्रसन्न हो एक हजार गाडी लकडी से महापिङ्गल को जलाकर अनेक सहस्र घडो से आग बुझाई। फिर बोधिसत्त्व को राज्य पर अभिषिक्त कर 'हमे धार्मिक राजा मिला' सोच (वे) प्रसन्न हो नगर मे उत्सव-भेरी बजवा, ऊँची ध्वजाओ तथा पताकाओ से नगर को अलङ्कृत कर, दरवाजे दरवाजे पर मण्डप बनवा, लाज-पुष्प बिखरे सजे हुए मण्डपो मे बैठ कर खाने पीने लगे। बोधिसत्त्व भी अलङ्कृत महान् तल पर (बिछे) श्रेष्ठ आसन के बीच मे, जिस पर श्वेत छत्र छाया हुआ था बैठे। अमात्य, ब्राह्मण, गृहपति, राष्ट्रिक तथा द्वारपाल आदि राजा को घेर कर खडे थे। एक द्वारपाल थोडी ही दूर पर खडा हो आस्वास-प्रश्वास लेता हुआ रोने लगा। बोधिसत्त्व ने उसे देख पूछा—सोम्य ! मेरे पिता के मरने पर सभी प्रसन्न हो उत्सव मना रहे है। लेकिन तू खडा रो रहा है। क्या मेरा पिता तुम्हे ही प्रिय था ? यह पूछते हुए पहली गाथा कही— सब्बो जनो हिंसितो पिङ्गलेन तस्मि गते पच्चयं वेदयन्ति, पियो नु ते आसि अकण्हनेत्तो कस्मा नु त्वं रोदसि द्वारपाल ॥ [ पिङ्गल ने सब जना को कष्ट दिया । उसके मरने पर सभी आनन्द का अनुभव करते है। हे द्वारपाल ! क्या वह तेरा ही प्रिय था ? तू क्यो रोता है ? ]
कारण से रोता है ? अट्टकथा में कस्मा तुवं पाठ है।
[ २.६.२४० हिंसितो नाना प्रकार के दण्ड बलि आदि से पीडा दी। पिङ्गलेन पिङ्गल आँख वाले ने, उसकी दोनो आँखें एकदम पिङ्गल वर्ण की, बिल्ली की आँखो के समान थी। इसीसे उसका नाम पिङ्गल हुआ। पच्चयं वेदयन्ति प्रीति अनुभव करते हैं। अकण्हनेत्तो पिङ्गल आँख वाला। कस्मा नु त्वं तू किस कारण से रोता है ? अट्टकथा में कस्मा तुवं पाठ है। उसने उसकी बात सुन उत्तर दिया—मैं इस शोक से नही रोता हूँ कि महापिङ्गल मर गया। मेरे सिर को तो सुख हुआ है। पिङ्गल राजा प्रासाद से उतरते हुए और चढ़ते हुए हथौडी से चोट लगाने की तरह मेरे सिर पर आठ आठ टोके लगाता था। वह परलोक जाकर भी जैसे मेरे सिर में टोके लगाता था उसी तरह निरयपालको तथा यमराज के सिर में भी टोके लगाएगा। 'यह हमे बहुत कष्ट देता है' सोच वह इसे फिर यहाँ लाकर छोड जा सकते हैं। वह मेरे सिर में फिर टोके मारेगा। मैं इस भय के कारण रोता हूँ। यह अर्थ प्रकट करते हुए दूसरी गाथा कही— न मे पियो आसि अकण्हनेत्तो भायामि पच्चागमनाय तस्स, इतो गतो हिंसेय्य मच्चुराजं सो हिंसितो आनेय्य पुन इध ॥ [ मुझे पिङ्गल नेत्र प्रिय न था। मुझे डर है कि वह फिर न लौट आए। यहाँ से जाकर वह यमराज को कष्ट दे। और (कही) यमराज कष्ट पाकर उसे फिर यहाँ ले आए । ] बोधिसत्त्व ने उसे आश्वासन दिया—वह राजा लकडी के हजार भारो से जला दिया गया है। सैकडो घडो से (चिता) बुझा दी गई है। जिस जगह जलाया गया, वह जगह चारो ओर से खन दी गई है। जो परलोक जाते हैं उनका यह स्वभाव है कि वह दूसरी जगह जन्म ग्रहण करते हैं। फिर उसी शरीर से नही आते हैं। इसलिए तू मत डर। यह गाथा कही—
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पिङ्गल
महापिङ्गल ] ४३१ दड्ढो वाहसहस्सेहि सित्तो घटसतेहि सो, परिक्खता च सा भूमि मा भायि नागमिस्सति ॥ [ हजार भारो से जला दिया गया है। सैकडो घडो से (चिता) ठडी कर दी गई है। वह भूमि खन दी गई है। मत डर, वह नही आएगा। ] तब द्वारपाल को सन्तोष हुआ। बोधिसत्त्व धर्म से राज्य करके दान आदि पुण्य कर यथाकर्म (परलोक) गए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पिङ्गल देवदत्त था। पुत्र तो मै ही था।
२४१. सब्बदाठ जातक
दूसरा परिच्छेद १०. सिगाल वर्ग २४१. सब्बदाठ जातक “सिगालोमानत्यट्ठो...” यह शास्ता ने वेळुवन मे विहार करते समय देवदत्त के बारे में कही। क. वर्तमान कथा अजातशत्रु को प्रसन्न कर देवदत्त ने जो लाभ सत्कार पैदा किया था वह उसे देर तक स्थिर न रख सका। नालागिरि (हाथी) का प्रयोग करने के समय जो आश्चर्य देखा गया उस समय से वह लाभ-सत्कार नष्ट हो गया। एक दिन भिक्षुओं ने धर्मसभा मे बातचीत चलाई—आयुष्मानो, देवदत्त लाभ-सत्कार पैदा करके चिरकाल तक स्थिर न रख सका। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त ने अपने लाभ-सत्कार को नष्ट किया है, पहले भी नष्ट किया ही है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व उसका पुरोहित था, तीनो वेदो तथा अठारह शिल्पो में पारङ्गत। वह पृथ्वीजय मन्त्र जानता था। पृथ्वीजय मन्त्र जापमन्त्र है। एक दिन बोधिसत्व उस मन्त्र को सिद्ध करने की इच्छा से एक खुली जगह में एक पत्थर पर बैठकर मन्त्र जाप करने लगा। वह मन्त्र किसी दूसरे
सब्बदाठ ] ४३३
विधिरहित व्यक्ति को नहीं सुनाया जा सकता था, इसीलिए वह वैसी जगह जाप करने लगा था। उसके पाठ करने के समय एक गीदड़ ने एक बिल में पड़े पड़े उस मन्त्र को सुनकर अभ्यास कर लिया। वह अपने पूर्व-जन्म में पृथ्वीजय मन्त्र का अभ्यासी एक ब्राह्मण था। बोधिसत्त्व ने पाठ कर चुकने पर कहा—मुझे इस मन्त्र का अभ्यास हो गया। गीदड़ ने बिल से निकल कर कहा—भो ब्राह्मण ! मुझे इस मन्त्र का तुझ से भी अधिक अभ्यास है। इतना कहकर वह भाग गया। बोधिसत्त्व ने यह सोच कि यह गीदड़ बहुत खराबी करेगा 'पकड़ो पकड़ो' कहते हुए उसका पीछा किया। गीदड़ भागकर जंगल में जा घुसा। वहाँ जाकर उसने एक गीदड़ी के शरीर में थोड़ा सा बुडका भरा। वह बोली— स्वामी ! क्या है ? 'मुझे पहचानती है या नहीं ?' उसने कहा—स्वामी ! पहचानती हूँ। उसने पृथ्वीजय मन्त्र का जाप कर सैकड़ों गीदड़ों को आज्ञा दे सब हाथी, अश्व, सिंह, व्याघ्र, सूअर, मृग आदि चौपायों को अपने पास बुलाया। सब को अपने अधीन कर स्वयं सब्बदाठ नामक राजा बन एक गीदड़ी को पटरानी बनाया। दो हाथियों की पीठ पर सिंह बैठता। सिंह की पीठ पर पटरानी सहित सब्बदाठ राजा बैठता। बड़ी शान थी। वह ऐश्वर्य-मद में चूर हो, अभिमान के मारे वाराणसी राज्य जीतने की इच्छा से सब चौपायों को ले वाराणसी से कुछ ही दूर पर आ पहुँचा। बारह योजन की परिषद थी। उसने कुछ ही दूर से ही राजा के पास सन्देश भेजा—राज्य दे अथवा युद्ध करे। वाराणसी निवासिया ने भयभीत हो डर के मारे नगर के द्वार बन्द कर लिए। बोधिसत्त्व ने राजा के पास आकर कहा—महाराज ! मत डरें। सब्ब- दाठ गीदड़ के साथ युद्ध करने की जिम्मेवारी मेरी है। मेरे अतिरिक्त और कोई उससे युद्ध नहीं कर सकता। उसने राजा तथा नगर वासियों को आश्वा- सन दे सब्बदाठ क्या करके राज्य जीतेगा पूछने की इच्छा से नगर-द्वार की अट्टालिका पर चढ़कर पूछा—सब्बदाठ ! क्या करके इस राज्य को लेगा ? “सिंहनाद कराकर, जनसमूह को शब्द से भयभीत कर राज्य लूँगा।” २८
[४३४] [ २.१०.२४१
बोधिसत्त्व ने “यह है” जान अट्टालिका पर चढ मुनादी करवा दी कि सारी बारह योजन वाराणसी के नगर निवासी अपने अपने कानो के छिद्रो को माष (की दाल) के आटे से लीप लें। जनता ने मुनादी सुन बिल्लियो से लेकर सभी जानवरो के तथा अपने कानो के छिद्र माष के आटे से इस प्रकार लीप लिए कि दूसरे का शब्द न सुन सके। बोधिसत्त्व ने फिर अट्टालिका पर चढकर पुकारा--- “सब्बदाठ !” “ब्राह्मण ! क्या है।” “इस राज्य को कैसे ग्रहण करेगा।” “सिंहनाद करवा कर, मनुष्यो को डरा कर, जान मरवा कर ग्रहण करूँगा।” “सिंहनाद नही करवा सकेगा। जाति-सम्पन्न, लाल हाथ पाँव वाले, केशर सिंह राज तेरे जैसे नीच गीदड की आज्ञा नही मानेंगे।” गीदड ने अभिमान से चूर हो कहा--दूसरे सिंह रहें। जिस सिंह की पीठ पर मै बैठा हूँ उसीसे सिंहनाद करवाऊँगा। “यदि सामर्थ्य है तो सिंहनाद करवा।” जिस सिंह पर बैठा था उसने उसे पांव से इशारा किया कि सिंहनाद कर। सिंह ने हाथी के सिर पर मुंह रख तीन बार ऐसा सिंहनाद किया, जैसा कोई न कर सके। हाथियो ने डरकर गीदड़ को पैरो मे गिरा पाँव से उसके सिर को कुचल चूर्ण विचूर्ण कर दिया। सब्बदाठ वही मर गया। वे हाथी भी सिंह- नाद सुनकर भय के मारे एक दूसरे से भिडकर वही मर गए। सिंहो को छोड़ कर शेष जितने भी खरगोश और बिल्ला से लेकर मृग सूअर आदि थे सभी जानवर वही मर गए। सिंह भाग कर अरण्य मे चले गए। बारह योजन में मास का ढेर लग गया। बोधिसत्त्व ने अटारी से उतर नगर द्वारो को खोल मुनादी करा दी कि सभी अपने कानो में से माष के आटे को निकाल दें और जिन्हे मास की जरूरत हो मास ले जाएं। मनुष्यो ने गीला मास खाया और बाकी को सुखा कर बल्लूर¹ बना लिया। कहते हैं उसी समय से मास सुखाना प्रारम्भ हुआ।
¹ बल्लूर=सूखा मांस।