जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२८ [ २.६ २४० २४०. महापिङ्गल जातक “सब्बो जनो ..” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय देवदत्त के बारे में कही। क. वर्तमान कथा देवदत्त के शास्ता के प्रति बैर बांध लेने के नौ महीने बाद जेतवन के द्वार-कोठे पर (उसके) पृथ्वी द्वारा निगल लिए जाने पर जेतवनवासी तथा सकल नगर के निवासी यह सोच कि बुद्ध के मार्ग का कण्टक देवदत्त पृथ्वी के द्वारा निगल लिया गया और अब सम्यक सम्बुद्ध का शत्रु मर गया बड़े सन्तुष्ट हुए। उनसे परम्परा-घोष¹ से सुनकर सारे जम्बूद्वीपवासी तथा यक्ष भूत और देवगण भी बड़े हर्षित हुए। एक दिन भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो, देवदत्त के पृथ्वी द्वारा निगल लिए जाने पर महा-जन-समूह यह सोचकर कि बुद्ध का विरोधी देवदत्त पृथ्वी द्वारा निगल लिया गया हर्षित हुआ। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त के मरने पर जन- समूह हर्षित होता है और प्रसन्न होता है, पहले भी हर्षित हुआ है और प्रसन्न हुआ है।" इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में महापिङ्गल नाम का राजा अधर्म से, अनुचित ¹एक से दूसरा और फिर उससे तीसरा सुने।