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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

कह आर्य-सत्यों का प्रकाशन कर, जातक का सारांश निकाला। सत्यों का

१२८ [ १.१५.१४६ तथा हि भय तज्जितो, मैं इसी बार प्रवेश करने से भी भयभीत हो गया; मरण भय से त्रास को तथा उद्विग्नता को प्राप्त हुआ। इतना कह और वहाँ से भाग फिर उस अथवा अन्य किसी भी हाथी के शरीर को खड़े होकर देखा तक नहीं। उस के बाद से लोभ के वशीभूत नहीं हुआ। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला कर कहा—भिक्षुओ, अन्दर जो मैल पैदा हो जाए उस चित्त के मैल को बढ़ने न देकर वही निग्रह करना चाहिए। इतना कह आर्य-सत्यों का प्रकाशन कर, जातक का सारांश निकाला। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर वह पाँच सौ भिक्षु अर्हत् हो गए। शेष में से कुछ श्रोतापन्न, कुछ सकृदागामी तथा कुछ अनागामी हुए। उस समय सियार तो मैं ही था।

१४६. एकपण्ण जातक

“एक पण्णो अयं रुक्खो...” यह शास्ता ने वैशाली के पास महावन की कूटागार शाला में रहते हुए वैशाली के एक दुष्ट-स्वभाव लिच्छवि-कुमार के बारे में कही।

क. वर्तमान कथा

उस समय वैशाली में गावुत गावुत¹ की दूरी पर तीन प्राकारें बनी थीं। तीनो जगहों पर गोपुर थे, अट्टालिकाएँ थीं तथा कोठे थे। इस प्रकार अत्यन्त शोभायमान था।

¹ गव्यूति=२ मील।

एकपण्ण ] १२६ वहां सदैव राज्य करवाते हुए रहनेवाले राजाओ की संख्या सात हजार सात सौ सात होती थी। उतने ही उपराजा होते थे। उतने ही सेनापति। उतने ही भण्डारी। उन राजकुमारो में एक कुमार दुष्ट लिच्छवि कुमार कहलाता था। वह क्रोधी था, प्रचण्ड था, कठोर था। डण्डे से छेड़े गए जहरीले सांप की तरह क्रोध से सदैव जलता रहता था। कोई भी उसके सामने दो तीन शब्द भी नहीं बोल सकता था। उसे न उसके माता पिता, न रिश्तेदार और न यार-दोस्त ही समझा सके। तब उसके माता पिता ने सोचा- "यह कुमार अत्यन्त कठोर स्वभाव का है दुस्साहसी है। सम्यक् सम्बुद्ध को छोड और कोई इसे विनयी नही बना सकता। हो सकता है कि यह उन्ही लोगो में से हो जो बुद्ध के विनीत बनाने से ही विनीत बनते है।" वे उसे शास्ता के पास ले गए और प्रणाम करके बोले- भन्ते ! यह कुमार प्रचण्ड है, कठोर है, क्रोध से जलता है। इसे उपदेश दे। शास्ता ने उस कुमार को उपदेश दिया- "कुमार ! प्राणियो के प्रति प्रचण्ड नही होना चाहिए, दुस्साहसी नही होना चाहिए, कष्ट देने वाला नही होना चाहिए। कठोर वाणी जिस माता ने जन्म दिया है उसको भी, पिता को भी, पुत्र को भी, भाई वहन को भी, भार्य्या को भी, मित्र बन्धुओ को भी अप्रिय होती है, अच्छी नही लगती। जो आदमी डसन के लिए आए सर्प की तरह, जगल म लूटमार करने के लिए तैयार चोर की तरह, खाने के लिए आए यक्ष की तरह उद्विग्न होता है, वह दूसरे जन्म म नरक आदि मे पैदा होता है। इस जन्म म क्रोधी आदमी सजा धजा रहन पर भी दुर्वर्ण ही होता है। इसका पूर्ण चन्द्र की सी शोभा वाला भी चेहरा आग से जल कमल के सदृश अथवा मैले कञ्चन के शीशे की तरह भोंडा हो जाता है, देखने में बुरा लगता है। क्रोध के कारण ही प्राणी शस्त्र लेकर स्वयं अपने को मार डालते हैं। विष खा लेते हैं। रस्सी से फांसी लटक जाते है। प्रपात से गिर पडते हैं। इस प्रकार क्रोध के वशीभूत हो मरकर वह नरक आदि में पैदा होते हैं। दूसरो को कष्ट देनेवाले भी इस जन्म में निन्दा को प्राप्त हो मरन पर नरक आदि म उत्पन्न होते है। फिर जब मनुष्य होकर पैदा होते हैं तो फोडा फोड के ही रूपद से रुककर प्राय रोगी रहते हैं। आँख की बीमारी तथा कान की बीमारी आदि रोगो में एक से उठने पर दूसरी बीमारी में फँस ६

१३० [ १.१५ १४६ जाते हैं। रोग से मुक्त न हो सकने के कारण नित्य दुखी रहते हैं। इसलिए सभी प्राणियों के प्रति मैत्री भावना रखनी चाहिए। सभी का हित चिन्तक होना चाहिए। सभी के प्रति कोमल चित्त वाला होना चाहिए। क्योकि इस प्रकार का (क्रोधी) आदमी नरक आदि के भय से मुक्त नहीं होता। वह कुमार शास्ता का एक ही उपदेश सुनकर मान-रहित हो गया, शान्त इन्द्रिय हो गया, क्रोध-रहित हो गया, मैत्री-चित्त वाला हो गया तथा कोमल चित्त का हो गया। उसे कोई गाली देता, मारता तो भी वह उसकी ओर रुख कर न देखता। वह ऐसा सांप हो गया जिसके दांत उखाड़ दिए गए हों, ऐसा केकड़ा हो गया जिसके डंक जाते रहे हों, ऐसा बैल हो गया जिसके सींग न हों। उसका समाचार जानकर भिक्षुओं ने धर्म-सभा में बातचीत चलाई— आयुष्मानो ! दुष्ट लिच्छवि कुमार को चिर काल तक उपदेश देते रहकर भी न माता पिता न रिश्तेदार-मित्र आदि ही उसे विनीत बना सके। सम्यक् सम्बुद्ध ने उसे एक ही उपदेश से ऐसा कर दिया जैसे किसी मस्त हाथी को शान्त कर दिया हो। यह ठीक ही कहा गया है—भिक्षुओ ! हाथी-दमन करने वाला खूब हाथी को दमन करता है तो दमन किया हुआ हाथी एक ही दिशा में दौड़ता है चाहे पूर्व दिशा में, चाहे पश्चिम दिशा में, चाहे उत्तर दिशा में अथवा दक्षिण में। भिक्षुओ, घोड़ा-दमन करनेवाला जब घोड़े को दमन करता है तो दमन किया हुआ घोड़ा एक ही दिशा में दौड़ता है चाहे पूर्व दिशा में, चाहे पश्चिम में, चाहे उत्तर में, अथवा दक्षिण में। भिक्षुओ, बैल को दमन करने वाला जब उसे दमन करता है, तो दमन किया हुआ बैल एक ही दिशा में दौड़ता है चाहे पूर्व दिशा में, चाहे पश्चिम में, चाह उत्तर में अथवा दक्षिण में। लेकिन भिक्षुओ, जिसे तथागत अर्हत्सम्यक् सम्बुद्ध शिक्षित करते हैं वह आठ दिशाओं में जाता है रूपवान् रूपों को देखता है, यह एक दिशा है • सञ्ज्ञा तथा संज्ञा का जो निरोध है उसे प्राप्त कर विचरता है, यह आठवीं दिशा है। वह दिशाओं में अनुपम पुरुष-दम्य-सारथि कहलाते हैं।¹ आयुष्मानो ! सम्यक् सम्बुद्ध के समान पुरुषों का दमन करनेवाला सारथि नहीं है। ¹ मज्झिम निकाय (३)

शिक्षित किया है।' इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—

एकपण्ण ] १३१ शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—"भिक्षुओ ! मैने इसे केवल अब ही एक ही उपदेश से शिक्षित नही किया है, पहले भी एक ही उपदेश से शिक्षित किया है।' इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय म वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व ने उदीच्य ब्राह्मण कुल में पैदा हो, बडे होने पर तक्षशिला मे तीनो वेद और सभी शिल्प सीखे । फिर कुछ समय घर म रहकर माता पिता के मरने पर ऋषियो की प्रव्रज्या के ढंग से प्रव्रजित हो अभिज्ञा और समापत्तियाँ प्राप्त कर हिमालय में प्रवेश किया । चिरकाल तक वहाँ रहन के बाद नमक और खटाई खाने के लिए जनपद म आकर वाराणसी पहुँच राजा के उद्यान म रहा । फिर एक दिन अच्छी तरह से वस्त्र पहन, आच्छादित हो, तपस्वी के रूपरग मे भिक्षा माँगने के लिए नगर में प्रविष्ट हो राजा के आँगन में पहुँचा । राजा ने झरोखे से देखा तो उसकी चाल-ढाल से मन प्रसन्न हुआ । उसने देखा कि यह तपस्वी शान्त इन्द्रिय तथा धान्त मनवाला है । चलता है तो नीची नजर करके युग मात्र१ देखता हुआ चलता है । मालूम होता है कि कदम कदम पर एक एक हजार की थैली रखता हुआ सिंह की तरह चला आ रहा है। 'यदि कही पर शान्त धर्म नाम की कोई चीज है तो वह इसके अन्दर अवश्य होगी' सोच एक आमात्य की ओर देखा । 'देव ! क्या आज्ञा है ?' 'इस तपस्वी को ले आयो ।' वह 'देव ! अच्छा' कह बोधिसत्व के पास गया । वहाँ पहुँचकर बोधि- सत्त्व को प्रणाम कर उनके हाथ से भिक्षा-पात्र लिया । बोधिसत्त्व ने पूछा— “महापुण्यवान् ! क्या बात है ?” “भन्ते ! महाराज आपको याद कर रहे हैं।” १युग, दो हाथ तक ।

१३२ [ १.१५.१४६

“हम राजकुल में आने जाने वाले नहीं हैं, हम हिमवन्त निवासी हैं।” आमात्य ने जाकर राजा से यह बात कही। राजा बोला—हमारे यहाँ आने जाने वाला कोई भिक्षु नहीं है। उन्हें जाकर ले आओ। आमात्य ने जा बोधिसत्त्व को प्रणाम कर, प्रार्थना कर, साथ लिवा राज- भवन में पहुँचाया। राजा ने बोधिसत्त्व को प्रणाम कर, श्वेत छत्र लगे हुए सोने के सिंहासन पर बिठा, अपने लिए तैयार किए गए नाना प्रकार के भोजन खिलाकर पूछा—'भन्ते ! कहाँ रहते हैं?' 'महाराज ! हम हिमवन्त-निवासी हैं।' 'अब कहाँ जा रहे हैं।' 'महाराज ! वर्षा-ऋतु के अनुकूल निवास स्थान की खोज है।' 'तो भन्ते ! हमारे ही उद्यान में रहें।' उनसे स्वीकृति ले अपना भी भोजन समाप्त कर राजा बोधिसत्त्व के साथ उद्यान गया। वहाँ पर्णशाला बनवा, उसमें रात के रहने योग्य तथा दिन में रहने योग्य स्थान तैयार करवा, प्रव्रजितों की आवश्यकताएँ दे, उनकी सेवा आदि के लिए उद्यानपाल को भार सौंप स्वयं नगर को लौटा। उस समय से बोधिसत्त्व उद्यान में रहने लगे। राजा भी दिन में दो तीन बार उनकी सेवा में जाता। उस राजा का दुष्ट कुमार नाम का पुत्र था। वह क्रोधी था, कठोर था। न उसे राजा ही विनीत बना सका, न बाकी रिश्तेदार। आमात्यों और ब्राह्मण गृहपतियों ने क्रुद्ध होकर इतना कहा कि 'हे स्वामी ! ऐसा न करें। ऐसा न कर सकेंगे।' इतने से भी वह उसे कुछ न समझा सके। राजा ने सोचा मेरे शीलवान् तपस्वी के अतिरिक्त कोई दूसरा इस कुमार को विनीत नहीं बना सकता। वह कुमार को बोधिसत्त्व के पास ले गया और उन्हें सौंपते हुए कहने लगा —भन्ते ! यह कुमार क्रोधी है, कठोर स्वभाव का है। हम इसे विनीत नहीं कर सकते। आप इसे किसी ढंग से शिक्षा दें। इतना कह चला गया। बोधिसत्त्व ने कुमार के साथ उद्यान में घूमते हुए नीम का एक पौधा देखा जिसके एक ओर एक पत्ता, दूसरी ओर दूसरा पत्ता—इस प्रकार कुल दो पत्ते थे। बोधिसत्त्व ने कुमार से कहा—कुमार ! इस पौधे के पत्ते खाकर इसका

एकपण्ण ] १३३ रस चखो। उसने उसका एक पत्ता मुंह में रखने ही उसका रस चख "थू" करके जमीन पर थूका। "कुमार यह क्या ?" "भन्ते ! यह पौधा अभी हलाहल विष के समान है, बड़े होने पर तो यह बहुत मनुष्यों की जान लेगा।" इतना कहते हुए उसने नीम के पौधे को उखाड़कर हाथों से मल डाला और यह गाथा कही— एकपण्णो अय रुक्खो न भुम्या चतुरङ्गलो, फलेन विस कप्पेन महाय किं भविस्सति ॥ [ इस पौधे का केवल एक पत्ता है और यह भूमि से चार अंगुल ऊँचा नहीं। विष जैसे पत्तेवाला यह बड़ा होकर क्या होगा । ]

एक पण्णो, दोनों ओर एक एक पत्ता है। न भुम्या चतुरङ्गुलो, भूमि से चार अंगुल भी ऊँचा नहीं बढ़ा है। फलेन, अर्थात् पत्ते से। विसकप्पेन, हलाहल विष जैसे से। इतना छोटा होता हुआ भी ऐसे कड़वे फल वाला है। महायं किं भविस्सति, जब यह वृद्धि पाकर बड़ा होगा तब कैसा होगा ? निश्चय से मनुष्य की जान लेने वाला होगा। इसी से उखाड़ कर हाथ से मलकर फेंक दिया—यह कहा। तब बोधिसत्त्व ने उसे कहा—'कुमार ! तूने इस पौधे को यह सोचकर कि यह अभी से इतना तीता है, बड़े होने पर इससे किसी की क्या उन्नति होगी, तोड़ कर, मरोड़ कर फेंक दिया। जैसे तूने इसके प्रति बरताव किया, ठीक इसी तरह तेरे राष्ट्र के बासी भी यह सोचेंगे कि यह कुमार क्रोधी है, कठोर स्वभाव का है, बड़ा होने पर राज्य प्राप्त करके क्या करेगा ? इससे हमारी उन्नति कहाँ होगी ? वह तुझे राज्य न दे, नीम के पौधे की तरह उखाड़कर तुझे राष्ट्र से निकाल देंगे। इसलिए नीम के पौधे के स्वभाव को छोड़ अब से शान्ति, मैत्री तथा दया से युक्त हो। उस समय से उसने अभिमान छोड़ दिया। नम्र हो गया। शान्ति, मैत्री और दया से युक्त हो बोधिसत्त्व के उपदेशानुसार आचरण कर पिता के मरने पर राज्य प्राप्त किया। फिर दान आदि पुण्य कर्म करता हुआ यथाकर्म (परलोक) सिधारा।

लिच्छवि कुमार को सीधा नहीं किया, पहले भी सीधा किया है" कह जातक का

१३४ [ १.१५ १५० शास्ता ने यह धर्म-देशना सुना "भिक्षुओ ! मैंने केवल अभी इस दुष्ट लिच्छवि कुमार को सीधा नहीं किया, पहले भी सीधा किया है" कह जातक का मेल बैठाया । उस समय दुष्ट कुमार यह लिच्छवि कुमार था। राजा आनन्द था। उपदेश देनेवाला तपस्वी मैं ही था । १५०. सञ्जीव जातक “असन्तं यो पग्गण्हाति ” यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय अजातशत्रु राजा द्वारा किए गए दुर्गुणी के आदर के बारे में कही। क. वर्तमान कथा उसने बुद्धो के विरोधी, दुश्चरित्र, पापी देवदत्त के प्रति श्रद्धावान् हो, उस दुष्ट असत्पुरुष को ऊँचा स्थान दे उसका आदर करने की इच्छा से बहुत सा धन खर्च करके गया-सीस पर एक विहार बनवा दिया। उसी की बात मान अपने पिता को जो कि श्रोतापन्न आर्य-श्रावक था मरवा डाला । इस प्रकार अपने श्रोतापन्न होने की सम्भावना में बाधा डाल विनाश को प्राप्त हुआ। जब उसने सुना कि देवदत्त को जमीन निगल गई तो उसे डर हुआ कि कहीं उसे भी जमीन न निगल जाए। भयभीत होने से उसका राज्य-सुख जाता रहा। शय्या पर सोता तो उसे सोने में मजा न आता। तीव्र वेदना से पीडित हाथी के बच्चे के समान वह इधर उधर विचरता । उसे ऐसा दिखाई देने लगा जैसे पृथ्वी फट गई हो, उसमें से अवीचि-ज्वाला¹ निकल रही हो, और पृथ्वी ¹ अवीचि नरक से निकलने वाली ज्वाला ।

सञ्जीव ] १३५

उसे निगले जा रही हो, तप्त लोह शय्या पर लिटाकर लोहे की कीलें ठोकी जा रही हो। इससे उस राजा को चोट खाए मुर्ग की तरह क्षण भर के लिए भी शान्ति न थी, कांपता ही रहता था। उसने सम्यक् सम्बुद्ध के दर्शन कर उनसे क्षमा माँगने की तथा शंका मिटाने की इच्छा थी। लेकिन अपने अपराध के भार के कारण उसकी जाने की हिम्मत न हुई। राजगृह नगर में कात्तिकोत्सव था। नगर देवनगर की तरह अलङ्कृत था। महल पर अमात्यगणों से घिरा राजा स्वर्ण सिंहासन पर बैठा था। उसने देखा कि कौमारभृत्य जीवक पास ही बैठा है। उसके मन मे आया कि मै जीवक को लेकर सम्यक् सम्बुद्ध के पास जाऊँ। लेकिन उसने साथ ही सोचा कि मैं जीवक को सीधा तो यह नही कह सकता कि हे जीवक ! मै सम्यक् सम्बुद्ध के पास जाना चाहता हूँ। अकेला नही जा सकता। मुझे बुद्ध के पास ले चल। मै उसे एक ढग से कहूँगा—रात्रि के सौन्दर्य की प्रशंसा करके पूछूँगा कि आज हम किस श्रमण या ब्राह्मण का सत्संग करें, जिसका सत्संग करने से मन प्रसन्न हो। इसे सुन कर आमात्य अपने अपने शास्ता की प्रशंसा करेंगे। जीवक भी सम्यक् सम्बुद्ध की प्रशंसा करेगा। तब उसे लेकर बुद्ध के पास जाऊँगा। उसने पाँच पदो से रात्रि की प्रशंसा की—"भो ! चांदनी रात्रि लक्षण- सम्पन्न है। भो ! चांदनी रात्रि सुन्दर है। भो ! चांदनी रात्रि दर्शनीय है। भो ! चांदनी रात्रि मन को प्रसन्न करने वाली है। भो ! चांदनी रात्रि रमणीय है। आज की रात हम किस श्रमण या ब्राह्मण का सत्संग करें, जिसका सत्संग करने से चित्त प्रसन्न हो ?" एक आमात्य ने पूरण कश्यप की प्रशंसा की। एक ने मक्खलि गोशाल की। एक ने अजित केश कम्बल की। एक ने प्रबुध कात्यायन की। एक ने बेलट्ठिपुत्र सञ्जय की। एक ने निर्ग्रन्थनाथपुत्र की। राजा उनकी बातचीत सुन चुप रहा। वह महामात्य जीवक के कहने का ही विश्वास करता था। जीवक ने भी यह सोचकर कि जब राजा मेरे प्रति कुछ कहेगा, तभी देखूँगा मौन ही रक्खा। राजा ने पूछा—"जीवक ! तू क्यो चुप है ?" तब जीवक ने आसन से उठ जिधर भगवान् थे उधर हाथ जोडकर कहा—देव ! यह भगवान् अर्हंत सम्यक् सम्बुद्ध हमारे आम्रवन में रहते हैं।

१३६ [ १ १५ १५० उनके साथ साढे बारह सौ भिक्षु हैं। उन भगवान् की इस प्रकार की कीर्ति है कि यह अरहंत हैं ...इस प्रकार नौ तरह¹ के गुण हैं, वह और उनके जन्म के समय से पूर्व निमित्त आदि भेद तथा भगवान् के प्रताप को प्रकाशित कर कहा कि देव ! उन भगवान् बुद्ध का संसर्ग करें, धर्म सुनें तथा शंकाएँ मिटाएँ। राजा का मनोरथ पूरा हुआ। वह बोला—सौम्य ! जीवक ! हाथियों को सजवाओ। हाथियो को सजवा वह राजसी ठाट-बाट से जीवक के आम्रवन में पहुँच राजा ने देखा सुगन्धित बडे भवन में तथागत भिक्षु संघ से घिरे बैठे है। जैसे महान् सरोवर हो, किन्तु उसकी लहरें शान्त हो, वैसे ही भिक्षु- संघ को इधर उधर से देखकर राजा ने सोचा—ऐसी शान्त परिषद् तो मैने इससे पहले कभी देखी ही नही। उसने भिक्षु-परिषद् के उठने-बैठने के तरीके से ही प्रसन्न हो संघ को प्रणाम किया। फिर संघ की स्तुति करते हुए उसने भगवान् को प्रणाम किया और एक ओर बैठकर श्रमणत्व के फल के बारे में प्रश्न किया। भगवान् ने उसे दो भाणवारो में विस्तार करके सामञ्जफल सूत्र² का उपदेश दिया। सूत्र का उपदेश हो चुकने पर वह प्रसन्न हो भगवान् से क्षमा माँग आसन से उठकर चला गया। राजा के चले जाने के थोडी ही देर बाद बुद्ध न भिक्षुओ को बुलाकर कहा— भिक्षुओ, यह राजा जख्मी होगया समझो। भिक्षुओ, राजा को आहत हो गया समझो। यदि यह ऐश्वर्य्य के लोभ मे पडकर अपने धार्मिक, धर्म से राज्य करने वाले पिता को जान से न मरवाता, तो इसे इसी आसन पर रज रहित, मल- रहित धर्म-चक्षु, उत्पन्न हो जाता। देवदत्त के कारण, दुष्ट को वडा स्थान देने से वह श्रोतापत्ति फल को न प्राप्त कर सका। किसी दूसरे दिन भिक्षुयो ने धर्म-सभा म बातचीत चलाई—'आयुष्मानो ! अजातशत्रु ने दुष्ट का आदर करके, दुश्चरित्र, पापी देवदत्त की प्रेरणा से पितृ- ¹ इति पि सो भगवा¹, अरहं², सम्मासम्बुद्धो³, विज्जाचरणसम्पन्नो⁴, सुगतो⁵, लोकविदू⁶, अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि⁷, सत्था देवमनुस्सान⁸, बुद्धो भगवाति॥९ ² दीघ निकाय, (दूसरा सूत्र) ।

नाश किया है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही—

सञ्जीव ] १३७ हत्या करके श्रोतापत्ति फल से हाथ धोया। देवदत्त ने राजा का नाश कर दिया। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर 'भिक्षुओ, केवल अभी अजातशत्रु दुष्ट का सम्मान करके विनाश को प्राप्त नहीं हुआ पहले भी इसने दुष्ट का आदर कर अपना नाश किया है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व महा सम्पत्तिशाली ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला जाकर सब शिल्प सीख आए। फिर वाराणसी में प्रसिद्ध आचार्य्य हो पाँच सौ विद्यार्थियो को विद्या सिखाने लगे।

  • उन विद्यार्थियो मे एक सञ्जीव नाम का विद्यार्थी था। बोधिसत्त्व ने उसे मुर्दे को जिलाने का मन्त्र सिखाया। उसने मुर्दे को जिलाने का ही मन्त्र सीखा, फिर सुलाने का नही सीखा। एक दिन विद्यार्थियो के साथ जब वह लकडी बटोरने जगल गया तो उसने एक मृत-व्याघ्र को देखा। उसने अपने साथियो से कहा—मै इस मृत-व्याघ्र को जिलाऊँगा। विद्यार्थी—"नही जिला सकेगा।" सञ्जीवक—"तुम लोगो के देखते ही देखते जिलाऊँगा।" विद्यार्थी—"यदि जिला सकता है तो जिला।" इतना कहकर वे विद्यार्थी वृक्ष पर चढ गए। सञ्जीवक ने मन्त्र पढकर मृत- व्याघ्र पर ककर फेंके। व्याघ्र उठकर जल्दी से आया और सञ्जीवक का गला काट उसे मार स्वय भी वही गिर पडा। सञ्जीवक भी वही गिर पडा। दोनो एक ही स्थान पर मुर्दे हो गए। विद्यार्थियो ने लकडी ले आकर आचार्य्य को वह समाचार सुनाया। आचार्य्य ने विद्यार्थियो को बुलाकर कहा—तात ! दुष्ट को बडप्पन देनेवाले, जहाँ सम्मान नही करना चाहिए, वहाँ सम्मान प्रदर्शित करनेवाले इस प्रकार के दुख को अवश्य प्राप्त होते हैं। इतना कह यह गाथा कही— असन्तं यो पगण्हाति असन्तञ्चुपसेवति, तमेव घास कुरुते व्यग्घो सञ्जीविको यथा ॥

१३८ [ १.१५.१५० [जो दुश्चरित्र को बड़प्पन देता है, जो दुराचारी की संगत करता है, उसे वह दुराचारी वैसे ही खा जाता है जैसे जीवन-प्राप्तं व्याघ्र ।] असन्तं—तीन प्रकार¹ के दुश्चरित्र से युक्त, दुश्शील, पापी। यो पग्गण्हाति, क्षत्रिय आदि में जो कोई इस प्रकार के दुराचारी प्रव्रजित को चीवर आदि देकर अथवा गृहस्थ को उपराज वा सेनापति आदि का पद देकर बड़प्पन देता है, सत्कार तथा सम्मान प्रदर्शित करता है। असन्तञ्चुपसेवति, जो इस प्रकार के दुश्शील की संगति करता है। तमेव घासं कुरुते, उसी दुष्ट आदमी को, बड़प्पन देनेवाले को वह दुराचारी खा जाता है, नष्ट करता है। कैसे ? व्यग्घो सञ्जीविको यथा, जैसे सञ्जीवक नाम के विद्यार्थी ने मृत-व्याघ्र को मन्त्र पढ़कर जिलाया, जीवन-दान दे आदृत किया। उसने उस जीवन-दान देनेवाले सञ्जीवक का ही प्राण ले लिया। इस प्रकार जो कोई भी दुष्ट आदमी का आदर करता है, वह दुष्ट अपना आदर करनेवाले ही को नष्ट करता है ! इस तरह दुष्टो को बड़प्पन देनेवाले नाश को प्राप्त होते हैं। बोधिसत्त्व इस गाथा द्वारा विद्यार्थियो को उपदेश दे दानादि पुण्य करके कर्मानुसार परलोक सिधारे। शास्ता ने भी यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय मृत-व्याघ्र को जिलानेवाला विद्यार्थी अजातशत्रु था। चारो दिशाओ में प्रसिद्ध आचार्य्य तो मैं ही था। ¹ काय, वाक् तथा मन के पाप-कर्म ।

१५१. राजोवाद जातक

दूसरा परिच्छेद १. दळ्ह वर्ग १५१. राजोवाद जातक “दळ्हं दळ्हस्स खिपत्ति ...." यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय राजा को दिए गए उपदेश के बारे में कही। वह उपदेश तेसकुण जातक¹ में आएगा। क. वर्तमान कथा एक दिन कोशल-नरेश किसी पाप-कर्म सम्बन्धी ऐसे मुकद्दमे का जिसका निर्णय करना आसान नही था, फैसला करके प्रात काल का भोजन कर चुकने पर गीले हाथो ही अलंकृत रथ में बैठ शास्ता के पास गया। वहीं पुष्पित कमल सदृश चरणो में गिर कर प्रणाम किया और एक ओर बैठा। शास्ता ने पूछा—हन्त ! महाराज ! दिन चढ तुम कहाँ से आए ? राजा—भन्ते ! आज पापकर्म संम्बन्धी एक ऐसे मुकद्दमे का जिसका निर्णय करना आसान नही था, फैसला करने में लगे रहने के कारण समय नहीं मिला। अभी उसका फैसला कर, भोजन करके गीले हाथो ही आपकी सेवा मे उपस्थित हुआ हूँ। शास्ता—महाराज ! धर्म से, न्याय से, मुकद्दमे का फैसला करना शुभ- कर्म है। यह स्वर्ग का मार्ग है। लेकिन इसमे आश्चर्य की क्या बात है यदि तुम मेरे जैसे सर्वज्ञ से उपदेश लेते हुए भी धर्म से तथा न्याय से मुकद्दमे का फैसला करते हो। आश्चर्य तो इसी मे है कि पूर्व के राजा लोग जिन्होने ऐसे पण्डितो का ही उपदेश सुना जो सर्वज्ञ नही थे धर्म से तथा न्याय से मुकद्दमे के फैसले करते ¹ जातक (५२१)

इतना कह राजा के प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—

१४० [ २ । १५१ हुए चार अगत्तियों¹ से बचकर दस राजधर्मों से विरुद्ध न जा धर्मानुसार राज्य करते हुए स्वर्ग-मार्ग को भरनेवाले हुए। इतना कह राजा के प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व उसकी पटरानी की कोख में रह गर्भ की सम्यक् रक्षा होने पर माता की कोख से बाहर निकले। नाम-करण के दिन उसका नाम ब्रह्मदत्तकुमार ही रक्खा गया। क्रम से बढ़ते हुए सोलह वर्ष की आयु होने पर वह तक्षशिला जाकर सब शिल्पों में निष्णात हो पिता के मरने पर राजा हो धर्म से तथा न्याय से राज्य करने लगा। राग आदि के वशीभूत न हो वह मुकद्दमो का फैसला करता। उसके धर्म से राज्य करने से आमात्य भी धर्म से ही व्यवहारो (=मुकद्दमो) का फैसला करते। मुकद्दमो का धर्म से फैसला होने के कारण झूठे मुकद्दमे करनेवाले भी नही रहे। उनके न होने से राजाङ्गण में मुकद्दमे करनेवालो का शोर नही होता था। आमात्य सारा दिन न्यायालय में बैठे रहकर भी जब किसी को मुकद्दमा लिए आता न देखते तो उठकर चले जाते। न्यायालय खाली कर देने योग्य हो गए। बोधिसत्त्व सोचने लग कि मेरे धर्मानुसार राज्य करने के कारण मुकद्दमा करने वाले नही आते। शोर नही होता। न्यायालय छोड़ने योग्य हो गए। अब मुझे अपने दुर्गुणो की खोज करनी चाहिए। जब मुझे यह पता लग जाएगा कि यह यह मेरे दुर्गुण है तो उन्ह छोड़कर गुणवान बनकर ही रहूँगा। उसके बाद से वह खोजने लगे कि कोई मेरे दोष कहने वाला है ? उस महल के अन्दर कोई ऐसा नही मिला जो उनके दोष कहे। जो मिला प्रशसा करने वाला ही मिला। 'यह मेरे भय से भी केवल मेरी प्रशंसा ही करते होगे' सोच महल के बाहर रहने वाला की परीक्षा की। यहाँ भी कोई न मिला, तो नगर के अन्दर खोज की। नगर के बाहर चारो दरवाजा पर स्थित गाँवो में ¹छन्द, द्वेष, भय तथा मोह के वशीभूत हो पक्षपात करना।

राजोवाद ] १४१ राजा। वहाँ भी कोई दोष कहने वाला न मिला। प्रशंसा ही सुनने को मिली। तब बोधिसत्व ने जनपद में खोजने का निर्णय किया। आमात्यों को राज्य संभाल यह रथ पर चढ़ केवल सारथि को साथ ले भेष बदल नगर से निकला। जनपद में खोजते हुए वह राज्य की सीमा तक चला गया। जब वहाँ भी उसे कोई दोष दिखाने वाला नहीं मिला, प्रशंसा ही सुनाने वाले मिले तो प्रत्यन्त-देश¹ की सीमा पर से महामार्ग से नगर की ओर लौटा। उसी समय मल्लिक नाम का कोशल-नरेश भी धर्म से राज्य करता हुआ अपने दोष कहने वाले को ढूंढने के लिए निकला था। जब उसे महल में अन्दर रहने वालों आदि में कोई दोष कहनेवाला नहीं मिला, प्रशंसा करने वाले ही मिले तो वह जनपद म खोजता हुआ वहाँ पहुँचा। ये दोनों गाड़ियों के एक नीचे रास्ते पर आमने सामने हुए। रथों के लिए एक दूसरे को गुजरने देने की जगह नहीं थी। मल्लिक राजा के सारथि ने वाराणसी राजा के सारथि से कहा—अपने रथ को लौटा ले। वाराणसी राजा के सारथि ने कहा—तू अपने रथ को लौटा ले। मेरे रथ म वाराणसी राज्य के स्वामी महाराज ब्रह्मदत्त बैठे हैं। दूसरे ने भी कहा—इस रथ में कोशल राज्य के स्वामी मल्लिक महाराज बैठे हैं। तू अपने रथ को मोड़ कर हमारे राजा के रथ को जगह दे। वाराणसी राजा के सारथि ने सोचा—यह भी राजा है। अब क्या करना चाहिए? उसे एक उपाय सूझा कि राजा की आयु पूछकर जो आयु में छोटा होगा उसका रथ लौटवाकर जो बड़ा होगा उसके रथ के लिए जगह कर- वाऊँगा। ऐसा निश्चय कर उसने दूसरे सारथि से कोशल राजा की आयु पूछी। मिलान करने पर दोनों राजा समान आयु वाले निकले। फिर राज्य-विस्तार, सेना, धन, यश, जाति, गोत्र, कुल-भेद आदि के बारे में पूछा। दोनों तीन तीन सौ योजन राज्य के स्वामी निकले। दोनों की सेना, धन, यश, जाति, गोत्र तथा कुल-भेद सब एक सदृश था। तब सोचा जो अधिक शीलवान् होगा उसे ¹ राज्य-सीमा के बाहर।

१४२ [ २.१-१५१ जगह दी जायगी। उसने पूछा—सारथि ! तुम्हारे राजा का सदाचार कैसा है ?” उसने अपने राजा के दुर्गुणो को भी गुण बताते हुए कहा कि हमारे राजा में यह गुण है, यह गुण है, और यह गाथा कही— दळ्ह दळ्हस्स खिपत्ति मल्लिको मुदुना मुदु साधुम्पि साधुना जेति असाधुम्पि असाधुना, एतादिसो अय राजा मग्गा उय्याहि सारथि ॥ [ मल्लिक कठोर के साथ कठोरता का व्यवहार करता हैं, कोमल के साथ कोमलता का। भले आदमी को भलाई से जीतता हैं, बुरे को बुराई से। सारथि ! यह राजा ऐसा हैं। तू मार्ग छोड़ दे। ] दळ्ह दळ्हस्स खिपत्ति, जो बहुत कठोर होता हैं उसे कठोर वचन से वा प्रहार से ही जीतना चाहिए। ऐसे आदमी के प्रति यह कठोर व्यवहार करता है अथवा कठोर वचन का प्रयोग करता है। इस प्रकार कठोर होकर ही उसे जीतता हैं—यही प्रकट करता है। मल्लिको, उस राजा का नाम हैं। मुदुना मुदूं, कोमल स्वभाव वाले को स्वयं भी कोमल होकर जीतता हैं। साधुम्पि साधुना जेति असाधुम्पि असाधुना, जो सज्जन है, उनके प्रति स्वयं भी सज्जन बनकर उन्हें सज्जनता से और जो दुर्जन है उनके प्रति स्वयं भी दुर्जन बनकर उन्हें दुर्जनता से जीतता है। एतादिसो अय राजा, इस हमारे कोशल राजा का ऐसा सदाचरण है। मग्गा उय्याहि सारथि, अपने रथ को लौटाकर छोटे रास्ते से जा। हमारे राजा को रास्ता दे। तब वाराणसी राजा के सारथि ने पूछा—"भो ! क्या तुमने अपने राजा के गुण कह लिए ?” “हाँ।” "यदि यही गुण हैं, तो अवगुण कैसे होते हैं ?” "अच्छा ! यह अवगुण ही सही। तुम्हारे राजा में कौन से गुण हैं ?” "अच्छा तो सुनो" कह दूसरी गाथा कही—

राजोवाद ] १४३ अक्कोधेन जिने कोधं, असाधुं साधुना जिने जिने कदरियं दानेन सच्चेन अलिकवादिनं, एतादिसो अयं राजा मग्गा उय्याहि सारथि¹ ॥ [ क्रोधी को अक्रोध से जीतता है। बुरे को भलाई से। कंजूस को दान से। झूठे को सत्य से। यह राजा ऐसा है। इसलिए सारथि ! तू मार्ग छोड़ दे। ] एतादिसो, इन अक्कोधेन जिने कोध आदि कहे गए गुणों से युक्त। यह क्रोधी आदमी को स्वयं शान्त रहकर अक्रोध को जीतता है। असाधु को स्वयं भला होकर साधुता से। कदरियं, अत्यन्त कंजूस को स्वयं दाता बनकर दान से। अलिक वादिन, झूठ बोलनेवाले को स्वयं सत्यवादी बनकर। सच्चेन जिनाति मित्र सारथि ! मार्ग से हट जा। इस प्रकार के सदाचार से युक्त हमारे राजा को मार्ग दे। हमारा राजा ही मार्ग पाने के योग्य है। ऐसा कहने पर मल्लिक राजा तथा उसके सारथि, दोनों ने उतर कर, घोड़ों को खोल रथ को हटा वाराणसी के राजा को मार्ग दिया। वाराणसी राजा ने मल्लिक राजा को उपदेश दिया कि राजा को यह यह करना चाहिए ! फिर वाराणसी जा वहाँ दानादि पुण्य-कर्म करके जीवन समाप्त होने पर स्वर्ग- मार्ग ग्रहण किया। मल्लिक राजा ने भी उसका उपदेश ग्रहण कर जनपद में जा अपने दोष बताने वाले को बिना खोजे ही अपने नगर पहुँच दानादि पुण्य-कर्म करके स्वर्ग को प्रयाण किया। शास्ता ने कोशल-नरेश को उपदेश देने के लिए यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मल्लिक राजा का सारथि मोग्गल्लान था। राजा आनन्द था। वाराणसी राजा का सारथि सारिपुत्र था। राजा तो मैं ही था। ¹ धम्मपद (१७।३)।

१५२. सिगाल जातक

१४४ [ २ । १५२ १५२. सिगाल जातक “असमेक्खित कम्मन्त....” यह शास्ता ने कूटागार शाला में रहते समय वैशाली निवासी एक नाई के लड़के के बारे में कही— क. वर्तमान कथा उसका पिता राजाओ, रानियो, राजकुमारो तथा राजकुमारियो की हजामत बनाता, केश ठीक करता, शतरज¹ बिछाता तथा और भी सभी कार्य्य करता था। वह श्रद्धावान था। उसने बुद्ध धर्म तथा सघ की शरण गही थी। वह पञ्चशीलो की रक्षा करता था। बीच बीच में वह शास्ता का धर्मोपदेश सुनता हुआ, अपना समय व्यतीत करता था। एक दिन वह राजा के यहाँ काम करने जाते समय अपने पुत्र को साथ ले गया। पुत्र ने वहाँ एक देवप्सरा सदृश सजी हुई लिच्छवि कुमारी को देखा। वह उस पर आसक्त हो गया। पिता के साथ राजभवन से लौटने पर उसने कहा कि यह कुमारी मिलेगी तो बचूँगा, नही तो यही मेरा मरण होगा। इतना कह वह खाना पीना छोड़ चारपाई पर पड रहा। उसके पिता ने पास आकर कहा—तात ¹ अनधिकार इच्छा मत कर। तू नाई का लडका है। तेरी जाति छोटी है। लिच्छवि कुमारी क्षत्री की लडकी है। ऊँची जाति वाली। वह तेरे लिए योग्य नही है। तेरे लिए तेरी समान जाति और गोत्र की कोई दूसरी लडकी ला दूँगा। उसने पिता का कहना नहीं माना। उसके माता, भाई, बहन, चाची, चाचा ¹ दोनो ओर आठ आठ मोहरों के स्थान होने से शतरंज का पुराना नाम अट्ठपद है।

सिगाल ] १४५ सभी रिश्तेदारो तथा मित्रो आदि ने समझाने की कोशिश की । वे नही समझा सके । वह वही सूख सूख कर मर गया । उसका पिता शरीर का दाह-कर्म आदि कृत्य करके जब शोक कम हुआ तो शास्ता की वन्दना करने की इच्छा से बहुत सा गन्ध-माला-लेप आदि ले महावन पहुँच शास्ता की पूजा कर, प्रणाम कर एक ओर बैठा । शास्ता ने पूछा— “उपासक ! क्यो इन दिनो दिखाई नही देता ?” उसने वह हाल कहा । शास्ता बोले—“उपासक ! तेरा लडका केवल अभी अनधिकार इच्छा करके विनाश को प्राप्त नही हुआ, पहले भी हुआ है ।” उपासक के प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व जन्म की बात कही—

ख. अतीत कथा

पूर्व काल मे वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व हिमालय-प्रदेश मे सिंह होकर पैदा हुए । उनसे छोटे छ भाई थे और एक बहन थी । सभी काञ्चन-गुफा में रहते थे । उस गुफा से थोडी ही दूर रजत पर्वत पर एक स्फटिक गुफा थी । उसमें एक सियार रहता था । समय गुजरने पर उन सिंहो के माता पिता मर गए । वह अपनी बहन सिंह बच्ची को गुफा में छोड जाते और स्वय शिकार के लिए बाहर निकल मास ला कर उसे देते । वह सियार उस सिंह बच्ची को देखकर उस पर आसक्त हो गया । उसके माता पिता जब थे, तब तो उसे अवसर न मिलता था । अब इन सातो जनों के शिकार के लिए चले जाने पर स्फटिक गुफा से उतर काञ्चन-गुफा के द्वार पर जा सिंह बच्ची के सामने इस प्रकार कुछ लौकिक ढंग की गुप्त बातचीत कहता— ‘सिंह की बच्ची ! में भी चौपाया हूँ। तू भी चौपाया है । तू मेरी भार्या बन । मे तेरा पति बनूंगा । हम मिलकर प्रसन्नता पूर्वक रहेंगे । अब से तू मेरी प्रेमिका हो जा ।” वह उसकी बातचीत सुन सोचने लगी— “यह सियार चौपायो म सबसे निचले दर्जे का निकृष्ट प्राणी है, वैसे ही जैसे चाण्डाल । हम उत्तम राजकुल के है। यह मुझसे असभ्य अनुचित बात १०

१४६ [ २.१.१५२ चीत करता है। मैं इस प्रकार की बात चीत सुनकर जीकर ही क्या करूंगी ? सांस रोक कर मर जाऊँगी।" फिर उसने सोचा— "मेरा इस प्रकार यूँ ही मरना ठीक नही। मेरे भाई आते हैं। उन्हें कहकर मरूँगी।" सियार को भी जब उसकी ओर से कोई उत्तर न मिला तो उसने सोचा यह मुझसे सम्बन्ध नही करेगी। वह अफसोस करता हुआ स्फटिक गुफा में जाकर पड रहा। एक सिंह बच्चा भैस वा हाथो में से किसी को मार मास खा, बहन का हिस्सा लाकर बोला—"मांस खा।" "भाई ! में मांस नही खाऊँगी। में मरूँगी।" "क्यो ?" उसने वह हाल कहा। "अब वह सियार कहाँ है ?" उसने स्फटिक गुफा में पड़े हुए सियार को आकाश में हूँ समझा और बोली—"भाई ! क्या नही देखते हो ? यह रजत पर्वत पर आकाश में स्थित है।" सिंह बच्चा नही जानता था कि वह स्फटिक गुफा में लेटा है। उसने उसे आकाश में लेटा हुआ समझ सोचा "इसे मारूँगा" घोर सिंह-वेग के साथ उछल कर, स्फटिक गुफा पर छाती से चोट की। उसका हृदय फट जाने से वह मर कर वही गिर पड़ा। तब दूसरा आया। उसने उसे भी वैसा ही कहा। उसने भी वैसा ही किया और मरकर पर्वत के नीचे गिर पड़ा। इस प्रकार छओ भाइयो के मरने पर सबसे अन्त में बोधिसत्त्व आए। उसने उन्हें भी वह हाल कहा और यह पूछने पर कि अब वह कहाँ है बताया कि यह रजत पर्वत पर आकाश में लेटा है। बोधिसत्त्व ने सोचा—सियार आकाश में नहीं ठहर सकते। यह स्फटिक गुफा में पड़ा होगा। वे पर्वत के नीचे उतरे तो देखा कि छओ भाई मरे पड़े हैं। वे समझ गए कि अपनी मूर्खता के कारण विचार न कर सकने के कारण स्फिटल-

सिगाल ] १४७ गुफा न जानने से उसी से हृदय टकराकर मरे होगे । 'बिना विचारे जल्दबाजी करने वालो का काम ऐसा ही होता है' कह पहली गाथा कही— असमेक्खितकम्मन्तं तुरिताभिनिपातिनं, सानि कम्मानि तप्पेन्ति उन्हं बज्झोहितं मुखे ॥ [जो आदमी बिना विचारे जल्दबाजी में काम करता है, उसके वह काम ही उसे तपाते हैं; जैसे मुंह मे डाला हुया गर्म भोजन ।] असमेक्खितकम्मन्तं तुरिताभिनिपातिनं, जो आदमी जिस काम को करना चाहता है, यदि वह उसके दोषो का ख्याल न कर, उन पर विचार न कर जल्दबाज होकर जल्दी मे ही उस काम को करने को तैयार होता है, कूद पडता है, लग जाता है, उस बिना विचारे जल्दबाजी में काम करने वाले को वे इस प्रकार किए गए सानि कम्मानि तप्पेन्ति, सोच में डाल देते हैं कष्ट देते हैं । कैसे ? उन्हं बज्झोहितं मुखे जिस तरह खाते समय यदि इसका विचार न कर कि यह ठण्डा है, यह गर्म है गर्म भोजन मुख में डाल दिया जाए तो मुंह भी जलता है, गला भी जलता है और पेट भी जलता है; चिन्ता होती है तथा कष्ट होता है । इसी प्रकार उस तरह के आदमी को वह कर्म तपाते है । उस सिंह ने यह गाथा कह सोचा—मेरे भाई उपाय-कुशल नहीं रहे । सियार को मारने जाकर वह बडे जोर से कूद कर स्वय मर गए । मैं ऐसा न कर गुफा में पडे हुए ही सियार के हृदय को फाड डालूंगा । उसने सियार के चढने-उतरने के रास्ते का ख्याल कर उसके सामने खडे हो तीन बार सिंह नाद किया । पृथ्वी सहित आकाश गूंज उठा । सियार का हृदय स्फटिक गुफा में लेटे ही लेटे डर के मारे फट गया । वह वही मर गया । शास्ता ने कहा—इस प्रकार वह सियार सिंहनाद सुनकर मर गया । शास्ता ने बुद्धत्व प्राप्त किए रहने पर यह गाथा कही— सीहोच सीहनादेन बद्धरं अभिनादयि सुत्वा सीहस्स निग्घोस सिगालो दद्दरे वस भीतो सन्तासमापादि हृदयं चस्स अप्फलि ॥